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मैं कौन हूं:

“अतीत कई जन्म के कर्म, हमें एक ऐसे प्रारब्ध की ओर ले जाते हैं, जिसे हमें पूर्ण रूप से इस जन्म में भोगना पड़ता है.. वह क्षण पूर्ण रूप से याद ही नहीं जब मैं आभा शाहरा व्यक्ति के रुप में पुरानी कार्मिक यात्रा को पूर्ण कर, एक शुद्ध सकारात्मक श्रीनाथजी को समर्पितके आत्मा के रुप में उभर कर आयी”।

मुंबई, भारत में रहती हूँ और यहीं पर मेरा जन्म भी हुआ था। प्रभु कृपा से चार संस्कारी बच्चे हैं। जिस दुनिया में आप रहते हैं, उसमें रहते हुए भी आज मैं अपने जीवन को पूरी तरह से अपने प्रभु श्रीनाथजी के चरणों में समर्पित कर चुकी हूं। प्रभु श्रीनाथजी की कृपा मेरे चारों तरफ़ हमेशा फैली रहती है। ५० वर्ष की अवस्था ऐसी होती है जब अधिकांश लोग यह सोच कर अवसादग्रस्त हो जाते हैं कि उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय व्ययतीत कर लिया है, और भविष्य में कुछ नयापन नहीं दिखता। अकेलेपन की वास्तविकता मन को विचलित कर सकती है। परंतु, दिव्य कृपा से युक्त श्रीनाथजी के आशीष से मैं इसके विपरीत सोचती हूं। अपने जीवन की इस अवस्था को मैं सर्वाधिक संतुष्टिदायक, आनंदमय एवं रोचक अवधि के रुप में देखती हूं। शरीर त्यागने के क्षण तक मैं अपने जीवन की इस अवस्था को सर्वाधिक आध्यात्मिक अनुकंपा का समय मानती हूँ। ज़्यादा कर मानवता जिस सच्चाई को पाने की कोशिश में लगी है, वह प्रभु कृपा में मैं रहती हूँ। मेरा मानना है कि मैं इस शारीरिक सच्चाई (आभा शाहरा के रुप) से आगे निकल सकती हूं तथा आत्मा व ऊर्जा के स्तर पर उच्चता को स्पर्श कर सकती हूं। यह अभिमान की बात नहीं है, परंतु यह सत्य है जिस पर मैं विश्वास करती हूं, ‘पिछले जीवन के अवश्य ही कोई महान सात्विक कर्म हैं, जिसके कारण मुझे स्वयं ‘‘ठाकुरजी’’ ने चयनित किया है तथा दिव्य प्रेम, आध्यात्मिक भक्ति व आनंद का दिव्य अनुभव प्रदान किया है। मैं कुछ उच्चतर आध्यात्मिक सत्य एवं रहस्यों के लिए स्वयं को एक मध्यस्थ मानती हूं, जिसे हमारे इस विश्व में उजागर होना है। ईश्वर हमारे आस-पास बेहद जागृत अवस्था में उपस्थित रहता है और उसे दूर महसूस करने की अनुभूति हमारा अपना भ्रम होता है। ‘‘अत्यधिक दुर्लभ रुप से चयनित वैष्णवों को उस परिमंडल में प्रवेश करने की अनुमति है, जहां पर आप को निमंत्रित किया गया है।’’ मुझे बहुधा इसका संकेत मिलता रहा है।


अंदर एक बाहरी व्यक्ति के रुप में निवास करनाः

जब मैं अपने विगत जीवन पर दृष्टिपात करती हूं, तब मुझे उस मानसिक उथल-पुथल का स्मरण होता है, जिसका अनुभव मैंने ८ वर्ष की अवस्था में किया था। परंतु तब इसका अर्थ मुझे नहीं समझ में आया था। उस समय हम बच्चे थे और स्कूल व काॅलेज में अपनी पढ़ाई में व्यस्त थे।

आंतरिक मन की अशांति ने मुझे वाह्य विश्व के प्रति एक विरक्ति का अनुभव कराया। मैं शेष विश्व, उसकी मान्यताओं एवं कार्य करने के तरीके से सदैव ही अपना तादात्म्य अनुचिन्हित करने में कठिनाई महसूस करती थी। मैंने कभी भी अपने आप को किसी समूह का हिस्सा नहीं महसूस किया और इसके कारण मुझे घमंडी, अंतर्मुखी अथवा एक एकाकी व्यक्ति माना जाता था।

यद्यपि मैं एक नियमित जीवनचर्या वाली व्यक्ति रही हूं और एक संयमित व समयबद्ध जीवन जीती रही हूं तथा मेरा परिवार भी बहुत अद्भुत सुखों का दाता रहा है। परंतु यह भी सत्य है कि जो वाह्य जगत है उससे मैं कभी भी बहुत अधिक प्रसन्न नहीं रही। मेरा मस्तिष्क और मेरी आत्मा अपने आप को इस परिवेश में बहुत अधिक कठिनाई में महसूस करती रही है। मैं कभी भी स्वयं को किसी प्रकार के समूह का हिस्सा नहीं महसूस करती। वास्तव में, मैं यह कभी नहीं समझ सकी कि मैंने अनेक अवसरों पर अपने आप को अलग-थलग क्यों रखा।

मैं अपने विचारों को किसी और के सम्मुख नहीं रख सकी, क्योंकि मैं स्वयं ही यह नहीं जानती थी कि वास्तव में क्या घटित हो रहा है। आखिर वह क्या है जिसकी तलाश में मैं हर समय रहती हूं। आखिर वह कैसी रिक्तता है, जिसने मेरे मस्तिष्क, शरीर और आत्मा को अपने आगोश में ले कर रखा हुआ है?

वर्ष १९९४ तक एक ऐसी अनुभूति हुई जिसने मुझे यह एहसास कराया कि यह अपना स्वयं का मस्तिष्क है, जो मुझे अपने दैनिक जीवन में सुख की अनुभूति से वंचित रखता है। यह सदैव ही मुझे कुछ भिन्न निहितार्थ और अर्थों की ओर प्रवृत्त करने के लिए प्रयासरत रहता है, जिसे हम एक सामान्य जीवन कहते हैं।

उस समय अपने परिवार एवं बच्चों के साथ अत्यधिक व्यस्त होने की स्थिति में और उसके पहले अपने अध्ययन की व्यस्तता के बीच मुझे कभी भी न तो इतना समय मिला और न ही मैंने कभी ऐसा प्रयास किया कि मैं जीवन के उस गहन अनुभूति को महसूस कर सकूं।

उस समय अनेक ऐसे क्षण आए, जब मैंने अपने अस्तित्व को लेकर एक गंभीर अंतद्र्वन्द को महसूस किया। यह तलाश काफी गंभीर और घनीभूत थी तथा जैसे-जैसे समय बीतता गया, आध्यात्मिक पुस्तकें मेरी पहली गुरु बनती चली गयीं, परंतु प्रतिदिन ४ से ५ घंटे के दैनिक पाठन के बावजूद तथा विभिन्न आध्यात्मिक व धार्मिक गुरुओं से मिलने के बाद भी मैं किसी भी प्रकार के सार्थक उत्तर को प्राप्त करने में विफल रही।

एक बेहद अद्भुत परिवार और भौतिक आनंद के बावजूद यह उत्कट अभिलाषा तथा रिक्तता व पीड़ा, जिससे मैं पिछले ४०-४५ वर्षों से लगातार आक्रांत महसूस करती थी, मुझ पर हावी रही, और अपने आप को इस स्तिथि से दूर नहीं कर सकी।


एक साधिका के रुप में:

वर्ष २००४ में मेरी प्रारंभिक दीक्षा के बाद कुछ वर्ष पूर्व मैंने अपनी आत्मा की आवाज को समझा, जो मुझे अपने स्वयं के विषय में जागृत करने का प्रयास कर रही थी तथा वह मुझे अपनी आंतरिक वास्तविकता के प्रति सजग करने में संलग्न थी। मुझे वे क्षण भी याद है जब मैंने अंतरात्मा की इस पुकार को एक तरफ रखने का प्रयास किया, परंतु जब इसने अत्यधिक रिक्तता और कुछ बेहद अकुलाहट भरे प्रश्नों को उत्पन्न किया तो मैं एक विचित्र मनःस्थिति में आ गयी। ऐसे क्षणों में मैंने ईश्वर के समक्ष अपनी परिवेदना को दर्ज कराना भी प्रारंभ कर दिया, ‘‘यदि आप मुझे अपनी आत्म-चेतना से विमुख करना चाहते हैं, तो फिर मुझे यह बताइए कि आपने मुझे क्यों ऐसी उत्तरदायित्वपूर्ण स्थिति में रहने के लिए बाध्य कर दिया है। और यह कतई भी उचित नहीं होगा कि मैं वर्तमान जीवन के कर्मों से अपने आपको विमुख कर लूं तथा अपने आंतरिक अस्तित्व की ओर उन्मुख हो जाऊं।’’ जैसा कि श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में हमें बताया हैः ‘‘जब भी किसी व्यक्ति को वर्तमान के साथ साहचर्य स्थापित करने के लिए प्रस्तुत किया जाता है, तो इसके पीछे उसके विगत जीवन के कर्मों के लेन-देन की प्रवृत्ति उत्तरदायी होती है। आत्मत्याग तो केवल एक प्रकार की आकांक्षा है। क्रिया-कलाप ऐसा होना चाहिए, जो श्रेष्ठता और उत्कृष्टता का प्रदर्शक हो और इससे जो परिणाम भी उत्पन्न हो वह दैवीय चरणों में समर्पित होना चाहिए’’। श्रीकृष्ण के ये पवित्र शब्द किसी भी आत्मा को उसकी वर्तमान कार्मिक स्थिति से भटकाव की ओर उन्मुख होने की अनुमति नहीं देते हैं। ‘मैं कौन हूं, मेरा हृदय वास्तव में किसका अभिलाषी है’, यह प्रश्न मेरे हृदय में शूल के समान चुभता था।



आध्यात्मिक जागरण एवं अंतिम दीक्षाः

स्वयं के प्रति अनभिज्ञता के बावजूद भी मैं 1992/93 के दौर में आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर थी। मुझे मस्तिष्क, शरीर, प्रवृत्ति, स्वास्थ्य और भावनात्मक स्तर पर शुद्धीकृत होने में 10 वर्ष लगे। मैंने बहुत ही सजगतापूर्वक समझने का प्रयास किया और वर्ष 2000 तक मैंने स्वयं को उस महान पथ के गहन परिवेश में प्रवेश करते हुए पाया, जिसकी मुझे दैवीय स्तर पर प्रतीक्षा थी। वर्ष 2004 की मेरी प्रारंभिक दीक्षा मेरे जीवन का एक सजग मोड़ बिंदु बन कर प्रकट हुयी। मैंने जैसे-जैसे ध्यान की अवस्था में प्रवेश किया और अपने अंदर दैवीय प्रवाह का अनुभव किया, वैसे-वैसे मुझे वास्तविक अभाव का पता चला तथा मैंने यह महसूस किया कि दिव्यता की मेरी तलाश ही पीछे प्रमुख कारण थी एवं मैं अपने पूरे जीवन में इसी के लिए भटक रही थी और त्रुटिवश मैं वाह्य आयामों में इस दैवीय सत्य से साहचर्य का निरर्थक प्रयास कर रही थी। १६ अगस्त २००५ को मैंने अपनी अंतिम दीक्षा को प्राप्त किया। मैंने यह महसूस किया कि मैं अपनी स्वयं की नवीन वास्तविकता से साहचर्य स्थापित कर रही हूं और इस दिशा में मेरा एक नया जन्म हो रहा है। गुरुश्री ने अपना विशेष तिलक बनाया और एक सिद्ध मंत्र के साथ उसे मेरे ‘आज्ञा चक्र’ पर लगाया, जो त्रिनेत्र का क्षेत्र है। उस दिन से मेरी वास्तविक आध्यात्मिक यात्रा का प्रारंभ हुआ, और एक असाधारण अनुभूति का अनुभव होने लगा! मैं समझती हूं कि मैं उनके समान एक शुद्ध और शक्तिशाली गुरु से अंतिम दीक्षा प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त कर सकी। गुरुश्री उस क्षण में पूर्ण ऊर्जा के जीवंत प्रवाह के साथ उपस्थित थे। दिव्य प्रवाह के साथ उनकी बायीं हथेली दैवीय प्रेम और आशीर्वचनो का माध्यम बन गयी; जब भी कोई महत्वपूर्ण कार्य संपादित होने के लिए आवश्यक होता है, श्रीनाथजी आशीर्वाद के रुप में उनके साथ उपस्थित होते रहैं। इसलिए- मुझे किसने आशीर्वाद दिया? मुझे किसने अंतिम दीक्षा प्रदान की? मैंने किसके समक्ष अपने आप को समर्पित किया? समय के साथ मैंने यह समझा है कि इस विश्व में पूर्णता के साथ कैसे रहना चाहिए और अपने इस जीवन को सभी के लिए किस प्रकार साक्ष्य के रुप में प्रस्तुत करना चाहिए।’ ‘आत्मत्याग तो केवल एक प्रकार की आकांक्षा है। क्रिया-कलाप ऐसा होना चाहिए, जो श्रेष्ठता और उत्कृष्टता का प्रदर्शक हो और इससे जो परिणाम भी उत्पन्न हो वह दैवीय चरणों में समर्पित होना चाहिए’। उन क्षणों में जिस प्रकार से दैवीय आशीर्वचनों ने मेरे ढके हुए मस्तिष्क को आनावृत कर उसमें प्रवेश किया और मेरी अंतर्रात्मा में घुसपैठ किया, यह उस प्रकार की अनुभूति थी कि जैसे एक चेतना इस तन, मन और आत्मा पर सकारात्मकता का अभिषेक कर रही हो और यह मेरे अतीत के सभी प्रकार के संस्कारों को स्वच्छ एवं शुद्ध कर रही हो तथा यह शुद्धता मेरी अंतरात्मा को एक अभिनव स्वरुप प्रदान करने में सहायक बन रही हो एवं साथ ही साथ जन्म और पुनर्जन्म की मेरी इस यात्रा में एक दिव्य परिमार्जक के रुप में अपना योगदान दे रही हो। यह एक कार्मिक एवं आत्म शुद्धता की प्रक्रिया थी, जिसने गहन सकारात्मक परिवर्तनो के सृजन में सहायता की। ‘‘अपने जीवन के वास्तविक उददेश्यों को मत भूलिए’’, ऐसे मार्ग पर चलने के लिए गुरुश्री ने मुझे प्रेरित किया, ‘‘यह एक सर्वश्रेष्ठ अवधि होगी, जहां पर सत्य और वास्तविकता आपके समक्ष अनावृत होगी। समस्त जागृत अनुभवों के समक्ष यह मायावी जगत बेहद तुच्छ है। इसका कोई महत्व नहीं, जब एक बार आप ईश्वरीय प्रेम रुपी अमृत का स्वाद ग्रहण कर लेते हैं तब अन्य स्वाद आपके लिए महत्वहीन हो जाते हैं, उनके प्रति आपका कोई आकर्षण नहीं रह जाता। करोड़ों में कोई एक व्यक्ति ऐसा होता है, जो इन सभी परीक्षाओं में उत्तीर्ण होकर सक्षम बनता है और मायावी जगत के अवरोधों को पार कर दैवीय अमृत का पान करने में सफल होता है। सत्य और ईश्वर की खोज के मार्ग को कभी मत छोड़िए, समर्पण के मार्ग पर निरंतर अग्रसर रहिए। आपको शीघ्र ही श्रीनाथजी अर्थात् स्वयं परमात्मा के सुख रुपी अनुभव का प्रसाद प्राप्त होगा। समय के साथ जिन नकारात्मक कर्मों का विलोपन होगा और सकारात्मकता का प्रादुर्भाव होगा, उस प्रक्रिया में जाकर मैंने यह समझा है कि इस दैवीय संपर्क के लिए ही मेरी आत्मा वर्षों से तड़प रही थी और जैसे-जैसे मैंने इसमें गहनता से प्रवेश किया, वैसे-वैसे शांति एवं आनंद का विस्तार हुआ और मैंने प्रसन्नता व संतुष्टि की दैवीय अनुभूति को महसूस किया। शुद्धता की इस यात्रा में जागृति और धारणा में परिवर्तन हुआ, इसके अंतर्गत मैंने ईश्वर से पूछा कि, ‘‘क्या मैं पागलपन की ओर

उन्मुख हो रही हूं अथवा यह विश्व ही पागलपन व दीवानगी से भरा हुआ है।’’

यह अनुभव हमारे सामान्य नियमित और दैनिक जीवन से बिलकुल परे है।


जागृत आत्माः

कुछ वर्ष पूर्व मैंने अपने मौजूदा नाम आभा शाहरा में एक नाम का समावेश किया। पूर्ववर्ती व्यक्तित्व नाम आभा शाहरा केवल मेरे मस्तिष्क व शरीर को विश्लेषित करता था, परंतु मेरी जागृत आत्मा से गहरे संपर्क के साथ अब इसे एक अतिरिक्त आयाम की आवश्यकता पड़ी। इसलिए मैंने पहले से मौजूद अपने वाह्य व्यक्तित्व नाम में एक अतिरिक्त आयाम का समावेश किया। इसलिए मैंने इसमें ‘श्यामा’ को जोड़ा। यह जागृत आत्मा के लिए पूर्ण शुद्धता एवं भक्ति से परिपूर्ण नाम है। यह कहीं न कहीं एक ऐसे संपर्क को प्रतिध्वनित करता है, जहां पर मैं प्रभु श्रीनाथजी से जुड़ी हुयी हूं। आभा-शाहरा मस्तिष्क और शरीर है, जबकि ‘श्यामा’ मेरी जागृत आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है। ‘….दिव्य श्रीजी के साथ उनकी विलक्षणता ने मुझे पूर्ण भक्ति की ओर प्रवृत्त किया और इसके बाद मुझे किसी अन्य स्थान पर जाने की इच्छा नहीं हुयी, इस स्थान पर मैं अपनी आत्मिक यात्रा की पूर्ति करने में सक्षम रही हूं। मुझमें जिस ऊर्जा का प्रवाह हो रहा है वह सशक्त है, ऐसी अनेक विविध प्रकार की आंतरिक सुगंधियों का मैं अनुभव करती आ रही हूं। शरीर कभी भी एकाकी नहीं रहता, यह सदैव ही यह महसूस करता है कि कोई रहस्यमय शक्ति इस पर सक्रिय है और इसे एक दिशा प्रदान कर रही है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि उसके शरीर व मस्तिष्क पर एक प्रभुत्व स्थापित हो गया है, जो इसे शुद्ध और अत्यधिक सात्विकता प्रदान कर रहा है….’ मैंने सर्वोच्च सत्य के धरातल पर अपने जीवन को जीने की पद्धति को सीखा है, ‘दूसरे लोग क्या कहते हैं और क्या सोचते हैं, इससे परे जाकर यदि आपकी मंशा सही है तो आपको भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। आपके जीवन में ऐसे क्षण अवश्य आते हैं, जब आप को आत्मा की आपके ईश्वर से साहचर्य स्थापित करने की अभिलाषा का पालन करना पड़ता है और आप इस दिशा में अवश्य आगे बढ़ें। आप केवल इसलिए अपनी आध्यात्मिक यात्रा परित्याग न कर दें क्योंकि कुछ लोगों को सत्य की समझ नहीं होती, आप इस सबसे ऊपर उठ कर इस महान आध्यात्मिक यात्रा पर अग्रसर होते रहें।’ ठाकुरजी के साथ प्रारंभिक दैवीय संपर्क, जिसने मेरी भक्ति को जागृत किया तथा मेरी आत्मा को श्रीनाथजी के प्रेम के आकर्षण से वशीभूत होने के लिए प्रेरित किया। दिव्य श्रीनाथजी के प्रति पूर्ण समर्पण के साथ, जिन्होंने कुछ वर्ष पूर्व मेरे ‘महा गुरुश्री’ बनने की इच्छा को स्वीकार किया था। मेरा यह मानना है कि मैं इस धरती की सबसे सौभाग्यशाली व्यक्ति हूं। जब ध्यान की गहन प्रक्रिया में मैंने प्रभु श्रीनाथजी व श्रीराधाकृष्णजी की दैवीय उपस्थिति का अनुभव किया, तब उन्होंने यह घोषित किया कि, ‘‘तुम मेरी सर्वश्रेष्ठ मित्र हो और तुम मेरे संपर्क में आने वाली एकमात्र मित्र बनी रहोगी।’’ (वार्ता वर्ग में विस्तृत विवरण) उनके आशीर्वाद की छत्रछाया में मैंने अनेक आध्यात्मिक रहस्यों का दर्शन करने का साक्षी बनने का सौभाग्य प्राप्त किया है। यह सारे रहस्य इस दिव्य संपर्क से मेरे समक्ष अनावृत हुए हैं। अक्टूबर 2004 नाथद्वारा में मैंने सर्वप्रथम श्रीनाथजी का गुरुश्री के साथ अक्टूबर 2004 में दर्शन किया था। 16 से 18 फरवरी के बीच मेरा यहां पर दूसरी बार आगमन हुआ, जो मेरे जीवन का मोड़ बिंदु सिद्ध हुआ। फरवरी 2005 16 से 18 फरवरी 2005 आत्म-साक्षात्कार के एक अन्य स्तर पर प्रवेश की यात्रा के समान था। अब यह एक स्वप्न के समान लगता है। यह अनुभव दैवीय था, यह इस भौतिक जगत से परे तथा हमारे वास्तविक जीवन के चिंतन से पूरी तरह से भिन्न और अलौकिक था। सुधीर भाई के अति गहन आभा-मंडल में नाथद्वारा में 60 घंटे व्ययतीत करना मेरे लिए आध्यात्मिक अनुभव के एक बेहद भिन्न स्तर से परिचित होने के समान था। सुधीर भाई श्रीजी बाबा से बेहद निकट रुप से संबद्ध रहे हैं। मैंने वहां पर बिताए गए उन 50 घंटों को एक ऐसी आत्मा के साथ निकटता से महसूस किया, जो उस आराध्य देव का एक अप्रकटीकृत स्वरुप है, जिनका दर्शन मैंने किया था। मैंने कभी भी यह कल्पना नहीं की थी कि यह दर्शन मेरी मनःस्थिति पर इतना शक्तिशाली प्रभाव डालेगा। हमने कुल 14 बार दर्शन किया और हम दोनो दिन एक गोशाला में गए, जहां पर गए बिना इस यात्रा को अपूर्ण माना जाता है। मैं इन दो दिनो के दौरान शायद ही कभी सोई थी। इस दौरान मैं महज 3 से 4 घंटे ही सोई हुंगी, मैं लगातार 36 घंटे जगी रही थी। इससे मुझे किसी भी प्रकार की कोई भी थकान महसूस नहीं हुयी और न ही मैंने आराम करने की आवश्यकता को महसूस किया। सुधीर भाई सदैव ही उच्च स्तरीय शुद्धता पर जोर देते थे। प्रत्येक दर्शन के बीच में यदि हमें मंदिर से बाहर जाना होता था, तो एक ‘मिश्रण’ का उपयोग कर स्नान करना आवश्यक होता था। इन दो दिनो में मैं कम से कम 10 से 12 बार अवश्य नहायी हुंगी। इसके पूर्व शुद्धता के इतने उच्च स्तर के साथ मेरा इतना निकटतापूर्ण संपर्क कभी नहीं हुआ था और न ही कभी ऐसे एकाग्र भाव के साथ प्रभु से समीकृत होने का इतना दिव्य अवसर प्राप्त हुआ था। यह बिना किसी मादक पदार्थ के सेवन के होने वाले नशे के समान था। इसमें सबसे रोचक बात यह थी कि मैं अपने दैनिकजीवन के वास्तविक परिवेश में बिलकुल भी वापस नहीं आना चाहती थी। कहीं गहन अंतर्मन में मैंने यह कामना और इच्छा की कि काश! यह समय ठहर जाए एवं इन दो दिवसीय दैवीय प्रक्रिया की बार-बार पुनरावृत्ति होती रहे। इसमें तृप्ति की कोई सीमा नहीं थी। मैंने चिंतन, वस्त्र, भोजन एवं वार्तालाप में मस्तिष्क, शरीर व आत्मा की पूर्ण शुद्धता को बरकरार रखने की महत्ता को समझा। अभी तक मुझे किसी भी मंदिर में दर्शन के इस स्तर से परिचित होने का अवसर नहीं प्राप्त हुआ था। प्रत्यक्ष अनुभव सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता है, परंतु इसके लिए श्रद्धा की आवश्कता होती है जो मायावी आवरण को हटाने में सहायता करती है, क्योंकि यह मायावी आवरण आपको कुछ बेहद स्वाभाविक तथ्य को समझने से वंचित कर देता है, आपकी आंखों पर एक पर्दा डाल देता है। जब एक व्यक्ति की आस्था सक्रिय स्वरुप ग्रहण कर लेती है, तब आध्यात्मिक वास्तविकता को अपना आकार ग्रहण करने के लिए किसी वाह्य पुष्टि की आवश्यकता नहीं होती है। सत्य हमारे आंखों के बिलकुल सामने होता है, जिसे हम स्पष्ट अनुभव कर आत्मसात कर सकते हैं। इसे शब्दों में अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसके प्रभाव का तब तक अनुभव नहीं किया जा सकता जब तक कि हम स्वयं को इसे समझने के लिए प्रस्तुत नहीं कर देते अथवा जब तक कि हम अपने ज्ञान चक्षुओं को खोल नहीं देते। सितंबर 2005 नाथद्वारा की मेरी अगली यात्रा सितंबर 2005 में हुयी, जो 5 दिनो की थी। वहां पर कोई टीवी, समाचार-पत्र अथवा टेलीफोन नहीं आता था, वह स्थान वाह्य जगत से प्रायः पूरी तरह से संपर्कहीनता की स्थिति में था। वहां पर रहते हुए यदि कोई विशेष आवश्कता होती है तभी संपर्क किया जाता है, वहां का भोजन बहुत साधारण होता है और हमारा अधिकांश समय मंदिर में श्रीजी बाबा के सानिध्य में बीतता था। इस बार हमने कुल 40 बार दर्शन किया और हम प्रत्येक दिन गोशाला में गए। ‘मैं कौन हूं’ यह मेरे चैतन्य मस्तिष्क से जुड़ गया है, और इसने मुझे सत्य की खोज में गहराई से प्रवेश करने की आवश्यकता से परिचित कराया है। मेरे व्यक्तिगत जर्नल में से.. नाथद्वारा के पहले प्रत्येक समय जब मैं ‘मुद्रा’ की अवस्था में बैठती थी, तब मेरी आंखों में आंसू होते थे, जो दुख के नहीं बल्कि अभिलाषा व इच्छा के होते थे। स्वयं को अनुभव करने की अदम्य अभिलाषा वृंदावन तथा अन्य विभिन्न वनो, भंदिल वन, सेवा कुंज, निकुंज वन, श्याम वन, वंशी वट इत्यादि स्थानों की वह पवित्र व्रज भूमि कदम्ब के वृक्ष और इन सब से बढ़ कर गिरिराज गोवर्धन का दर्शन, जहां पर आज भी श्रीनाथजी के साथ साक्षात्कार किया जा सकता है। यह एक शुद्ध सत्य का प्रतीक है। इस दैवीय भूमि की चित्ताकर्षक सुगंधि, जो मूलतः एक मौलिक वातावरण से उद्भूत है, एवं इन सब के दर्शन से मैं अपना जीवन धन्य महसूस करने लगी हूं। जब भी मैं इस अनुभूति की प्रक्रिया में जाती हूं, तब वहां पर वापस लौटने का मन करता है, मुझे किसकी पुकार है? जीहां, यह किसी समय की स्मृतियां हैं, किसी समयावधि की। और उस अतीत की समयावधि में वापस विचरण करने की अभिलाषा बलवती हो उठती है। इस अतिशय घनीभूत व दिव्य शक्तियों के सानिध्य में श्रीकृष्ण से विक्षोभ असंभव है, क्योंकि उनकी उपस्थिति में सब कुछ बहुत रोचक और आकर्षक प्रतीत होता है तथा यह अनुभूति प्रत्येक क्षण सजीव बनी रहती है.. यह विद्युत, यह ऊर्जा, यह शुद्धता, यह भक्ति और यह प्रेम, जिससे मैं पूरी तरह से भर चुकी हूं, बेहद आश्चर्यजनक है। सभी प्रकार के अवरोधों के बावजूद इस रहस्यमय शक्ति ने मेरे जीवन में प्रवेश किया तथा ज्ञान की खोज का शुभारंभ हुआ। कभी-कभी मैं महसूस करती हूं कि क्या मैं वहां पर उपस्थित हूं, परंतु ऐसा नहीं होता। यद्यपि जागृति की अवस्था बहुत उच्च अनुभूतियों वाली नहीं होती, परंतु मैं तो बस एक ऐसी अवस्था में विचरण करती हूं, जिसमें मैं स्वयं को एक व्यक्तित्व के रुप में स्वयं से विमुख कर देती हूं। परंतु उन क्षणों को मैं ऐसा महसूस करती हूं जैसे मैंने वास्तव में उन्हें जिया था और मुझे ऐसी इच्छा होती है कि वह क्षण सदैव के लिए मेरे पास बना रहे।


व्रज मंडल से मेरा संपर्कः

मेरा सौभाग्य रहा है कि मैं प्रायः व्रज मंडल (देव भूमि) की यात्रा करती रही हूं तथा मुझे श्री गोवर्धन एवं वृंदावन में लोगों का प्यार प्राप्त होता रहा है। मैं व्रज मंडल में गहन आनंद और सुख की अनुभूति करती हूं। वृंदावन की रोचकता और चुंबकीय आकर्षण अकल्पनीय है। व्रज वह स्थान है जहां से मैं संबद्ध हूं और यह मेरा वास्तविक घर है…. मेरी आत्मा श्रीनाथजी श्रीराधाकृष्ण की इस देवभूमि में शांति और असीम आनंद की अनुभूति करती है। व्रज मंडल से मेरा संपर्क बेहद स्वाभाविक व सच्चा रहा है, जिसका सर्वाधिक प्रमाणिक विवरण मेरे व्यक्तिगत जर्नल के मेरे पहले अनुस्मरणों में देखा जा सकता है। मेरी दीक्षा के बाद मेरी पहली यात्रा जून 2005 में हुयी थी। यह एक बार पुनः नाथद्वारा की यात्रा के समान रही है, जीवन के सभी पहलुओं में अनुशासन और शुद्धता का पालन पूरी तरह से किया जाता है। ‘उपस्थिति’ का शुद्धता के परिवेश में अनुभव किया जा सकता है और इस संदर्भ में हमारी भावपूर्णता बेहद आवश्यक है। साध्य गुरु, जो स्वयं देवत्व का एक अंग हैं व जो दिव्य गुरु के नाम से भी जाने जाते हैं, का शुद्ध सानिध्य तथा उनका सशक्त व शुद्ध प्रभा मंडल उस विशेष क्षेत्र में निवास करने वाले मनुष्यों को शक्ति प्रदान करने और उन्हें सक्षम बनाने में समर्थ है। इस समय लोग कुछ दैवीय अनुभवों को प्राप्त करने के लिए अपनी आत्मा को जागृत कर सकते हैं और उसके द्वार खोल सकते हैं। यह उनका एक मात्र गुण है जो एक विशेष आत्मा को दिव्य आत्मा से जोड़ता है तथा कुछ दिव्य अनुभूतियों से परिचित कराता है। यह एक ऐसी यात्रा थी जब श्रीनाथजी श्रीगोवर्धन पर अपने मुखारबिंदु से प्रकट हुए थे तथा अपने बाल स्वरुप में हमें साक्षात्द र्शन दिया था। गुरुश्री के निवेदन पर यह ऐसा हुआ था तथा इसके अतिरिक्त श्रीनाथजी ने अपनी छवि का दर्शन कराया और उन्होंने अपनी उपस्थिति के साक्ष्य के रुप में अपने मुखारबिंदु से प्रकट हो कर इस तथ्य को सिद्ध किया। उन असाधारण क्षणों की रोचकता और भावनात्मकता आज भी मेरे मस्तिष्क में तरोताजा है। अन्य अनेक लोगों द्वारा की जाने वाली अन्य अनुभूतियों में यह भी शामिल है कि किस प्रकार श्रीनाथजी ने हमें बंशी वट में स्थिति ‘चरण’ मंदिर का जीर्णोद्धार करने का आदेश दिया, जोकि श्रीराधाकृष्ण के प्रसिद्ध व दिव्य महारास का एक स्थल है। मेरे व्यक्तिगत जर्नल से.. ..समूचे पूजन की शुद्धता एवं उससे संबद्ध दृष्टि अनेक बातों को स्पष्ट करती है। पूजन के ऐसे क्षण स्मरणीय बन गए, मैं उन्हें आत्मिक उपस्थिति की संज्ञा से अभिहित करती हूं, क्योंकि दर्शन करते समय मस्तिष्क और शरीर में कुछ भी उपस्थित नहीं होता। यह वास्तविक मनुष्य के रुप में हमारा सत्व होता है, जो अपने वास्तविक स्वरुप में उपस्थित होता है। इसे शब्दों में नहीं बांधा जा सकता है, इसे सिर्फ अनुभव किया जा सकता है। दैवीय पूजन के दौरान जब मैंने श्रीराधाकृष्ण मंदिर में सिंदूर और तिलक का अभिषेक किया, तक एक शाश्वत प्रश्न मेरे मस्तिष्क में जीवंत हो उठा कि ‘मैं कौन हूं’ और इसके पूर्व मैंने ऐसी घनीभूत अनुभूति एवं भाव का कभी भी अनुभव नहीं किया था। स्वयं की पूर्ण स्वीकारोक्ति, जोकि मेरी पहचान की सत्यता को प्रमाणित करने में सक्षम थी।


विशेष अनुभूति जो इस बात की पुष्टि करती है कि श्रीनाथजी की शक्ति सैकड़ों वर्षों के अंतराल के बाद जागृत हुयी और यह शक्ति उनके मंदिर से बाहर निकल कर भौतिक जगत में प्रवेश कर गयीः

19-20 सितंबर 2005 राजभोग दर्शन के बाद मैं दोपहर बाद नाथद्वारा में विश्राम कर रही थी, तब यह दैवीय घटना घटित हुयी और इसका मैंने पूर्ण जागरण की अवस्था में अनुभव किया। मैंने एक अद्भुत आनंदमय दर्शन का अनुभव किया और मैंने देखा कि मैं श्रीनाथजी के पांव की छोटी अंगुलियों को पकड़ी हुयी हूं। श्रीजी की हवेली में एक मंगला दर्शन होता है, मैं स्वयं को वहां पर देख सकती हूं जहां पर मैं श्रीजी का पैर दबा रही हूं। इस दौरान वह मुझसे बातचीत कर रहे हैं! श्रीजी ने मुझसे यह शिकायत की कि उन्हें प्रतिदिन खड़े होने में कितनी थकान हो जाती है। ‘‘देखो, मेरे पैर में कितना कष्ट होता है, परंतु इसे कोई नहीं दबाता है। मैं सोचता हूं कि मैं नाथद्वारा छोड़ कर भाग जाऊं।’’ मैंने एक बार फिर श्रीजी से पूछा, ‘‘श्रीजी आपके हाथ में भी अवश्य कष्ट होगा। सैकड़ों वर्षों से आप अपने उद्धव भुजा को उठाए हुए हैं।’’ श्रीजी ने उत्तर दिया, ‘‘हां तुम बिलकुल सही हो, मेरे बाएं हाथ में भी कष्ट है।’’ आश्चर्यजनक रुप से उस क्षण में, श्रीजी ने अपनी बायीं भुजा को नीचे कर दिया तथा मेरे सिर और चेहरे को अलौकिक प्रेम एवं आशीर्वाद से भर दिया। एक ऐसे अलौकिक अनुभव को मैं क्या नाम दे सकती हूं! यह अद्भुत सामीप्य पूरे 45 मिनट तक बरकरार रहा। मैं उठी और इस अनुभव में विलीन हो गयी, मैंने गुरुश्री से इसके विषय में पूछा। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वे पहले से ही इसके विषय में जानते थे और इसलिए उन्होंने मुझे चुप करा दिया और उन्होंने कहा कि तुम कुछ समय के लिए इसे किसी को भी मत बताना। गुरुश्री ने मुझे बताया कि, ‘‘यह एक वास्तविक दर्शन है और तुम कोई स्वप्न नहीं देख रही थी’’। यह निश्चित रुप से एक वास्तविक घटना थी अथवा मैं वास्तव में इन अनेक वर्षों के बाद किस प्रकार से श्रीनाथजी द्वारा उद्धव भुजा को स्पर्श किए जाने के समान महसूस करने में सक्षम बनी और ऐसा अनेक वर्षों के बाद घटित हुआ। आज भी मैं श्रीनाथजी के नर्म और सौम्य हाथ को अपने सिर पर महसूस करती हूं तथा श्रीनाथजी द्वारा उद्भूत होने वाली असाधारण दिव्य ऊर्जा की अनुभूति करती हूं। यह मेरे गुरुश्री एव महागुरुश्री श्रीनाथजी की कृपा और अनुकंपा का ही फल है कि मैं इस देवीय प्रेम तथा आशीष को प्राप्त करने में सफल रही हूं।


एक लेखिका और छायाकार के रुप में

आध्यात्मिक पथ की एक गहन साधिका के रुप में, (ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार आप में से अधिकांश इसे पढ़ रहे हैं), मैंने अपने लेखन द्वारा अपने आध्यात्मिक अनुभवों और व्यक्तिगत चिंतन को अन्य साधकों के साथ साझा करने में आनंद की अनुभूति की है।

मेरा यह भी मानना है किः

लिखित शब्द केवल एक पाठक को स्पर्श करते हैं एवं कुछ को निर्देशन प्रदान करते हैं, विशेषकर जब अनुभव का सत्य अपने अंदर प्रवाहित होता है। केवल इसी अवस्था में शब्द किसी भी साधक में वास्तविक ज्ञान को प्रवाहित करने में सक्षम होते हैं। अनुभवजन्य लेखन रुपांतरण की शक्ति का वाहक होता है एवं उस सौम्य प्रेरणा को उपलब्ध कराता है, जब एक साधक भ्रम एवं संशय के तमस का सामना कर रहा होता है।

मेरा मानना है कि मैं उन सौभाग्यशाली लोगों में से एक हूं, जिन्हें विशेष अनुकंपा की प्राप्ति हुयी है। मैं पूर्ण रुप से उस स्थान पर पहुंच गयी हूं, जहां पर परिवर्तन की प्रक्रिया मेरे अंतःकरण में काफी गहराई तक प्रवेश कर गयी है और इस स्थिति ने स्थायी स्वरुप ग्रहण कर लिया है।

‘‘प्रत्येक व्यक्ति की जीवन यात्रा के लिए एक प्रारब्ध सुनिश्चित होता है, उसकी नियति लिखी जा चुकी होती है, इसलिए इस समूचे जगत के चिंतन और दर्शन को विश्लेषित करने के प्रयास में अपनी शांति और आनंदमय क्षणों को नष्ट न कीजिए, जहां तक संभव हो अपनी सर्वोत्कृष्ट क्षमता के साथ अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास कीजिए। यह परिवार और समाज के प्रति आपका धर्म है। इसके अतिरिक्त आपका एक उच्चतर धर्म भी है, जिसके अंतर्गत आपको स्वयं के चिंतन के उच्चतर स्तर पर पहुंचना होता है, इसलिए यह बहुत महत्वपूर्ण है कि आप अपने स्वयं के आनंद की दिव्य परिधि में विचरण करें।’’

मेरे लिए चित्र खींचना भी ध्यान के एक क्षण के समान है।

जीवन क्षण अथवा समय की एक सतत् यात्रा है। प्रत्येक क्षण एक अन्य क्षण की ओर गतिगान होता है। जीवन की गुणवत्ता इस बात पर निर्भर करती है कि आप प्रत्येक क्षण कितनी जागरुकता के साथ अपना जीवन संचालित करते हैं।

छायांकन क्षणों को जीवंत करने का एक माध्यम है। हम जीवन के महत्वपूर्ण क्षणों को कैद करते हैं। एक पल अथवा कुछ पलों को समेट लेते हैं। प्रत्येक क्षण ईश्वर की इस समूची सृष्टि में किसी न किसी के लिए कहीं न कहीं विशिष्ट एवं बहुमूल्य होता है।

धन्यवाद

सभी को हार्दिक आभार एवं आशीर्वाद के साथ,

ढेर सारा प्यार,

आभा शाहरा श्यामा

जय श्रीजी!

श्रीजी की जय हो!



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