श्रीनाथजी का गिरिराज गोवर्धन से श्री नाथद्वारा जाना

(यह श्रीनाथजी की प्रगट्य वार्ता की अगली कड़ी है)


।।श्रीनाथजी मेवाड़ पधारवे के सुधी कर एक असुर को श्री गिरिराज ते उठाय देवे की प्रेरणा किनी।।

।श्रीनाथजी मेवाड़ में ठहरने की अपनी प्रतिबद्धता को स्मरण करते हैं, इस प्रकार एक असुर को उन्हें गिरिराज से प्रस्थान करने में सहायता करने की प्रेरणा प्रदान करते हैं।।


अनेक वर्षों के बाद श्रीजी ने श्री गोसाईजी के समय में अजब से की गयी वचनबद्धता को याद किया। गोसाईजी की अजब को दी गयी प्रतिबद्धता के अनुसार उन्हें अनेक वर्षों के लिए मेवाड़ जाना था। इसके साथ ही साथ श्रीजी यह जानते थे कि श्री वल्लभाचार्य की वंश परंपरा के वाहक उन्हें तब तक वहां से जाने देने के लिए सहमत नहीं होंगे, जब तक कि उन्हें कुछ पाप शक्तियों द्वारा वहां से बलपूर्वक नहीं हटाया जाएगा। इसलिए उनकी दैवीय योजना के अनुसार उन्होंने एक मुगल बादशाह को यह आदेश दिया कि उन्हें गिरिराज गोवर्धन से हटने में सहायता करें एवं इसके अतिरिक्त उन्होंने लीला भी की, ताकि उनका स्वयं का मंदिर पवित्र बन जाए। उस समय श्री वल्लभजी महाराज का यह स्वप्न था कि श्रीजी गिरिराजजी से किसी अन्य स्थान पर चले जाएं।




गिरिराज गोवर्धन से सिंहद, नाथद्वारा की यात्रा


ठाकुरजी की अभिलाषा के अनुकूल मेवाड़ की यात्रा 1669 ईसवी आसाढ़ सद पूनम को शुक्रवार के दिन रात्रि के अंतिम 3 घंटों के दौरान प्रारंभ हुयी। श्रीनाथजी अपने सभी सेवकों के साथ 1672 ईसवी में फाल्गुन वद शतम को शनिवार के दिन सिंहद (नाथद्वारा) पहुंचे।


इसके बाद वार्ता के उत्तरार्ध में यह स्पष्ट होता है कि श्रीजी का रथ ठीक वहां पर आकर रुक गया, जहां के विषय में गोसाईजी ने अनेक वर्षों पूर्व भविष्यवाणी की थी। यह वह स्थान था जहां पर पहले कभी राजकुमारी अजब कुमारी की हवेली हुआ करती थी, जो व्रज गिरिराज से उनका अंतिम गंतव्य बन गया।


बाद में समय के साथ श्रीनाथजी ने मेवाड़ में स्थानांतरित होने का निर्णय लिया। उन्होंने प्रत्यक्ष रुप से वार्तालाप व संपर्क करना बंद कर दिया एवं बाद की समयावधि में पूरी तरह से आंतरिक रुप से लीन हो गए, क्योंकि उन्हें आवश्यक भाव नहीं प्राप्त हो सका। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि प्रभु अपने भक्तों के साथ वार्तालाप करने और संपर्क स्थापित करने के लिए उनमें उच्चस्तरीय शुद्धता व भाव की आवश्यकता को महसूस है, जिसका दुर्भाग्यवश आज अभाव है।

इस समूची यात्रा के दौरान श्रीजी ने अपनी भक्त गंगाबाई नामक एक वृद्ध महिला को अपने पीछे के रथ पर ले चलने के लिए जोर दिया। वह उनकी आवाज बन गयीं। जब भी श्रीजी का रथ रुक जाता था, तब वह गंगाबाई से पूछते थे कि श्रीजी को क्या चाहिए। जब उनकी इच्छा की पूर्ति कर दी जाती थी, तब रथ पुनः चल पड़ता था। इस लंबी शोभा यात्रा में उनके सभी व्रजवासी मित्र एवं अनेक सेवक सम्मिलित थे। ये व्रजवासी आज भी नाथद्वारा में रहते हैं एवं अनेक पीढ़ियों से श्रीनाथजी की सेवा करते आ रहे हैं।


वार्ताः

जब शयन आरती समाप्त हो गयी और सारे सेवक चले गए, तब एक मुसलमान आया और अपनी दाढ़ी से जगमोहन और कमल चैक को साफ किया। वह इस कार्य को 12 वर्ष से कर रहा था, परंतु उसे कोई भी देख नहीं पाया था, क्योंकि वह आकाश मार्ग से आता था और उसी मार्ग से वापस चला जाता था। अंततः एक दिन श्री गोवर्धननाथजी ने उसकी सेवा को स्वीकार किया और अपने बंताजी से पान का दो बीड़ा दिया।

श्रीजी ने उसे आदेश दिया, ‘‘52 वर्षों में मैंने तुम्हें शासन करने का अधिकार प्रदान किया। तुमने आक्रमण किया है, इसलिए मुझे श्री गिरिराज को छोड़ कर छिपना पड़ेगा। मेरे मंदिर में पुनः कभी मत आना, क्योंकि मेरे जाने के बाद यह गुप्त हो जाएगा। तुम यहां पर एक मस्जिद बनवाओ और दंडवत उपासना करो, परंतु उसके अंदर कभी मत जाओ।’’ इस आदेश को ग्रहण कर वह मुसलमान आगरा चला गया और श्रीजी के आशीर्वाद से उसे शासन करने के लिए एक राज्य प्राप्त हुआ।


।।देशाधिपति ने एक हलकारा श्रीजी द्वार पठायो।।


यह वह तरीका है, जिसके अंतर्गत प्रभु अज्ञात तरीके से कार्य करते हैं। विश्व के लिए ऐसी घटनाएं दृश्य नहीं होतीं और न ही समझी जाती है, क्योंकि यह त्वरित रुप से घटित हो जाती हैं। इसे केवल ठाकुरजी की लीला के माध्यम से समझा जा सकता है।

जैसा कि प्रत्येक लोग सदैव ही यह बहस करते हैं कि यदि ठाकुरजी इतने शक्तिशाली हैं, तो आखिर वह क्यों मुगलों को इतना अधिक विध्वंस करने से नहीं रोक पाए?

कई बार हम यह नहीं समझ पाते कि केवल उनकी इच्छा से ही अनेक घटनाएं घटित होती हैं। यह हमें नहीं समझ में आ सकता, क्योंकि प्रभु इन्हें गुप्त रखना चाहते हैं।

यहां से श्रीजी ने अपनी प्रिय भक्त अजब को दी गयी वचनबद्धता को पूर्ण करने के लिए मेवाड़ के लिए प्रयाण किया, इसलिए उन्होंने अपने सेवकों के समक्ष ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न कर दीं ताकि वे उन्हें वहां से ले जाने के लिए विवश हो जाएं।


।।लीला में पधारे श्री गिरधारीजी श्री गोविंदजी को श्रीजी के आज्ञा अनुसार मेवाड़ पधारवे को सविस्तार वृत्तांत आज्ञा कियो।।


इस प्रकार जब मुगल आतताइयों का प्रभाव बढ़ने लगा, तब यह आवश्यक हो गया कि श्रीजी को आवश्यक स्थान पर भेजा जाए। इन आक्रांताओं ने मूर्तियों को नष्ट किया और हिन्दू मंदिरों में लूट-पाट की। उस अवधि में श्री गोविंद जी श्रीनाथजी की देख-भाल करने के प्रभारी थे। उनके बड़े भाई श्री गिरधारीजी पहले ही शाश्वत लीला में प्रवेश कर चुके थे। श्रीजी ने श्री गिरधारीजी को श्री गोविंदजी की चिंताओं के विषय में बताया।


इसलिए श्री गिरधारीजी श्री गोविंदजी के पास प्रकट हुए और उन्होंने श्रीनाथजी की स्वयं द्वारा यहां से मेवाड़ जाने की इच्छा के विषय में बताया।

यह श्रीनाथजी की इच्छा थी कि गिरिराज गोवर्धन पर गुप्त तरीके से क्रीड़ा करें। उन्हें अपने भक्तों की इच्छाओं की पूर्ति के लिए जाना होगा। श्री आचार्य जी ने श्रीजी की जन्म पत्रिका बनाई और उन्हें गोपाल नाम दिया। इस नाम का अर्थ यह है कि वह सदैव ही अपनी गायों की रक्षा करेंगे।


ये मुस्लिम आक्रांता श्रीनाथजी के स्थानांतरण के लिए केवल निमित्त मात्र थे। यात्रा के दौरान रास्ते में अनेक भक्त प्रतीक्षा कर रहे थे, जिनकी मनोरथ को श्रीनाथजी को पूरा करना होगा। इसलिए उनके रथ को तैयार करो और कल सूर्यास्त के बाद श्रीनाथजी के साथ यात्रा प्रारंभ करो। उनका जो भी आदेश हो उसका पालन करो और वह जहां भी जाना चाहते हैं वहां पर ले जाओ।

बड़े बाबू महादेव एक मशाल लेकर आगे चलेंगे और पथ प्रदर्शन करेंगे। पहली रात को आप आगरा में विश्राम करेंगे। यहां से आपको पहले से अग्रिम रुप से तैयार होकर अगले शिविर में जाना होगा, ताकि जब श्रीनाथजी वहां पर पहुंचें तब सब कुछ उनके लिए पूरी तरह से तैयार मिले।

श्रीनाथजी अपनी इच्छाओं को केवल अपनी भक्त गंगाबाई को बताएंगे, इसलिए आप उनसे पूछ लीजिएगा कि क्या करना है। सारी जानकारियों को बताने के बाद श्री गिरधारीजी श्रीजी मंदिर में वापस लौट गए।


।।श्री गिरिराज सू श्रीनाथजी मेवाड़ पधारवे को पहिले आगरा पधारे।।

।।श्री गिरिराजजी से रवाना होने के बाद श्रीनाथजी का पहला पड़ाव आगरा था।।


अगले दिन श्रीनाथजी को सबसे पहले उनका राजभोग प्रस्तुत किया गया तथा उनके रथ को उनकी यात्रा के लिए तैयार बनाने हेतु दंडवती शिला का उपयोग किया गया। तीनों भाई, श्री गोविंदजी, श्री बालकृष्णजी, श्री वल्लभजी व्रजवासियों एवं भक्तों के साथ एकत्रित हुए और उन्होंने श्रीनाथजी से प्रस्थान करने का निवेदन किया, परंतु श्रीजी वहां से नहीं चले।

इसलिए उन्होंने कुछ व्रजवासियों से कहा कि वे आएं और श्रीनाथजी को तनिक छेड़ें। जब उन्होंने ऐसा किया तब वह हंसने लगे और अब एक छोटे शिशु के समान अपने रथ में सवार हो गए, परंतु एक बार फिर रथ नहीं चल सका। जब पूछा गया तब श्रीजी ने कहा कि वह यह चाहते हैं कि गंगाबाई उनके रथ के पीछे चलें। जब श्रीनाथजी की इच्छा के अनुसार सारी तैयारी पूरी हो गयी, तब यात्रा का शुभारंभ हुआ।


।।दो जलघरिया सेवा और सभा को अलौकिक पराक्रम।।

।।दो जलघरिया सेवा एवं सभा में असाधारण सामथ्र्य।।


दो जल भरिया के अंतर्गत श्रीजी के सेवक नदी से जल को भरते थे। जब २०० मुसलमान सैनिक श्रीजी के मंदिर को नष्ट करने के लिए आए, तब उन लोगों ने संघर्ष किया और उस्ता के अतिरिक्त सभी को मार डाला।

इसके बाद उन्होंने उस्ता (नेता) को मुसलमान शासक के पास वापस भेज दिया, ताकि वह और अधिक सैनिकों के साथ वापस आ सके और दो जल भरिया को मार सके। ये दो सेवक काफी सशक्त और ऊर्जावान बन गए और वे 6 मास तक सिंह पोस पर बिना कुछ खाए-पिए डटे हुए थे। वह मुसलमान नेतृत्वकर्ता अन्य ५०० सैनिकों के साथ वापस आया, जिन्हें इन लोगों ने मार डाला।


श्रीजी ने यह महसूस किया कि ये दोनो बहुत शक्तिशाली हो गए हैं और यहां पर शेष म्लेच्छों को मारने की प्रतीक्षा कर रहे हैं, परंतु श्रीजी की योजना वहां से जाने की थी इसलिए उन्होंने दो जलभरियों को दर्शन दिया। ‘‘श्री गिरधारीजी ने तुम दोनो को सभी म्लेच्छों का संहार करने की शक्ति दी है, परंतु मेरी इच्छा भिन्न है। मैंने अनेक भक्तों को वचन दिया कि मैं उनसे रास्ते में भेंट करुंगा और मैंने जो वचन दिया है उसकी पूर्ति होना आवश्यक है, इसलिए इस संघर्ष को बंद करो। समूची वचनबद्धता को पूर्ण करने के बाद मैं व्रज वापस आउंगा। इसलिए तुम मेरी लीला में प्रवेश करो और युद्ध को बंद करो।

श्रीजी के आशीर्वाद से उन दोनो ने दिव्य दृष्टि प्राप्त की और यह देखा कि श्री गिरिराज जी आभूषणों से चमक रहे हैं और अन्य अनेक मंदिर आभूषणों से अलंकृत हैं। इस मंदिर को भी आभूषणों से सुसज्जित दिखाया गया है। नगर थाना के निकट द्वार के बाहर उन्होंने उस महेजित एवं म्लेच्छ को भी देखा, जिसने अपनी दाढ़ी से उस स्थान की सफाई की थी। श्रीजी के आशीर्वाद से उन दोनो को पूर्ण ज्ञान प्राप्त हुआ। उन्होंने अपने शस्त्रों को फेंक दिया एवं अपने भौतिक शरीर को श्रीजी की लीला में प्रवेश करने के लिए त्याग दिया। भाइयों का नाम सेवा एवं सभा था।


बाद में कुछ दिनो के बाद मुसलमान बादशाह, वास्तुविद और भवन निर्माता एक सेना के साथ गिरिराजजी आए। परंतु वे मंदिर को नहीं देख सके जो गुप्त बन गया था, इसलिए उन्होंने एक मस्जिद का निर्माण किया और चले गए।


।।श्रीजी आगरा पधारे ताको सविस्तार वृत्तांत।।

।।श्रीजी का आगरे में प्रवास का विस्तृत विवरण।।


जब श्रीनाथजी गिरिराजजी से आगरा पहुंचे, तब भोर हो रही थी, सभी दरवाजे खुले हुए थे। द्वारपाल गहरी निद्रा में निमग्न था और उन्हें रोकने वाला कोई नहीं था।

इस प्रकार श्रीजी अपनी हवेली पहुंचे। स्वयं को सहज किया और यह घोषणा की कि यह वह स्थान है जहां पर वह अन्नकूट उत्सव को उल्लास के साथ पूर्ण करेंगे।

इस समय देशाधिपति अपनी मस्जिद में बिस्तर पर सो रहा था। श्रीनाथजी यहां पर प्रकट हुए और उसकी पीठ पर जोर से प्रहार किया तथा उसके स्वप्न में आदेश दिया, आज मैं आगरा में हूं, तुम्हें मेरा आदर करना होगा, मैं अपनी स्वतंत्र इच्छा से यहां पर आया हूं। तुम लोग हमें नहीं हरा सकते हो।

म्लेच्छ डर कर उठ गया, लेकिन वह श्रीनाथ जी को नहीं देख सका। जिस स्थान पर श्रीनाथजी ने उसकी पीठ पर जोरदार प्रहार किया था, वहां पर श्रीनाथजी के पैर का चिन्ह बन गया और उस पर एक कमल है। इस म्लेच्छ राजा ने गुप्त रुप से श्रीनाथजी की उपासना प्रारंभ की। वह चारा भाजी के साथ केवल जौ की दो रोटियां खाता था, पत्थर पर सोता था, वह श्रीनाथजी के दर्शन के लिए तपस्या कर रहा था।


।।नवनीत प्रिय जी को आगरा पधारे तको सविस्तार वृत्तांत।।

।।आगरा में श्री नवनीत प्रिय जी के आगमन का विवरण।।


वे एक रात में आगरा पहुंचे, श्रीजी यहां पर अपनी हवेली में ठहरे। श्री नवनीत प्रिय जी उस समय गोकुल में थे। कार्यकर्ताओं को इस आदेश के साथ भेजा गया, श्री दाऊजी महाराज और सभी पुत्रियों एवं पुत्र वधुओं को ले आओ और भिटेरिया मुखिया को बताओ, विठ्ठल दूबेजी को श्री नवनीत प्रिय जी को आगरा ले जाना है। जब विठ्ठल दूबेजी स्नान कर के श्री नवनीत प्रियजी को जगाने के लिए ले गए, तब मध्य रात्रि का समय हो रहा था और श्री नवनीत प्रियजी गहरी निंद्रा में थे तथा वह उनके जगाने पर नहीं उठे। वह तब भी नहीं उठे जब उन्होंने करबद्ध होकर निवेदन किया। शीघ्र ही श्री विठ्ठल दूबेजी ने यह महसूस किया कि श्री नवनीत प्रियजी सूर्योदय होने पर ही उठेंगे और वह चैक पर बाहर सोने के लिए चले गए। प्रातः 4 बजे उन्होंने पुनः स्नान किया और शुद्धता हेतु कुछ सामग्रियों को तैयार किया तथा एक बार पुनः श्री नवनीत प्रियजी को जगाया। उन्होंने मंगल भोग लगाया, फिर श्रृंगार भोग किया और श्री नवनीत जी को दो चार भिटेरिया व जल घरिया के साथ एक म्यानो में ले गए। ये सभी आगरा के लिए रवाना हो गए एवं गऊ घाट पहुंचे।

श्री गोसाई नाथजी के तीसरे पुत्र बालकृष्णजी, उनके भतीजे व्रजराजजी को एक आशीर्वाद प्रदान किया गया कि श्री नवनीत प्रियजी अपने हाथों से एक दिन के लिए राजभोग ग्रहण करेंगे। यहां पर विश्राम करने के बाद सभी उस हवेली के लिए रवाना हो गए, जहां पर श्रीनाथजी स्थापित थे। श्री गोविंदजी, श्री बालकृष्णजी, श्री वल्लभ, श्री दाऊजी एवं सभी पुत्रियां एवं पुत्र वधुएं श्री नवनीत प्रियजी का दर्शन प्राप्त कर काफी प्रसन्न थीं। उत्थापन व शयन को पूर्ण करने के बाद वह अपने विस्तर पर आराम करते थे।

श्री गोविंदजी ने दूबेज़ी मुथिया को बोलाया और उनसे कुछ आशीर्वाद प्रदान करने के लिए कहा, क्योंकि उन्होंने श्री नवनीत प्रियजी को आगरे में सुरक्षित पहुंचाया था।

दूबेजी, ‘‘कृपया हमें आशीर्वाद दीजिए कि श्रीनाथजी एवं श्री नवनीत प्रियजी का अपार स्नेह सदैव हमारे साथ बना रहे।’’

श्री गोविंदजी ने आशीर्वाद देते हुए कहा, ‘‘जैसा मेरे परिवार के साथ घटित हुआ है, वैसा ही आपके परिवार के साथ भी घटित होगा।’’ अनेक चमत्कारों को प्रदर्शित करने के बाद नवनीत प्रियजी को अंततः आगरा लाया गया और तब से वह श्रीजी के साथ नाथद्वारा में रह रहे हैं।


।।श्रीनाथजी को दंडौती घाटी में पधारनो।।

।।श्रीनाथजी का दंडौटी घाट में आगमन।।


यहां पर अनेक लीलाओं को करने के बाद आगरा में अन्नकूट पर्व को मनाते हुए श्रीनाथजी ने गंगाबाई को आदेश दिया कि, ‘‘मैं दंडौती घाट जाना चाहता हूं। तैयारी करो। राजभोग आरती पूर्ण करने के बाद वे दंडौती घाट के लिए रवाना हो गए। दरवाजे पर बैठा हुआ म्लेच्छ द्वारपाल अस्थायी रुप से दृष्टिबाधित हो गया। वह कुछ नहीं देख सकता था।

।।हल्कारन ने श्रीजी के आगरा पधारवे आदि के खबर देनी।।

।।हल्कारे ने आगरे में श्रीजी के आने की सूचना दी।।


अगले दिन हल्कारे इस समाचार के साथ बादशाह के पास पहुंचे, ‘‘देव जो गिरिराज से आए हैं उन्हें रात में हवेली में रुकना है, परंतु मुझे यह नहीं पता है कि वे सुबह कब जाएंगे।’’ बादशाह यह समझना चाहता था कि इस हवेली को लेकर यह द्वारपाल इतना आश्वस्त कैसे है।


हल्कारन ने उत्तर दिया, ‘‘साहब, इस क्षेत्र में पत्तल के अनेक दोने बेतरतीब बिखरे पड़े हैं। पनाले के जल का पर्याप्त मात्रा में इस्तेमाल किया जा रहा है। केवल गोकुल्या ही अत्यधिक जल एवं पत्तल दोने का उपयोग करते हैं।’’


यह सुन कर अंदर से बादशाह हंस पड़ा, ‘‘मैं जानता हूं कि वे यहां पर हैं। वास्तव में वे यहां पर कई दिन पहले आए थे और अभी उनके तीन दिन बचे हैं। (अर्थात् यहां के द्वारपाल अनेक दिनो से सो रहे हैं) परंतु मैं उनका शत्रु नहीं हूं। मैंने उनका आदेश प्राप्त किया है और जो आवश्यक था वह किया है। यह उनका आनंद है कि वह अगली क्रीड़ा यहाँ करना चाहते हैं। इस बात को किसी को भी मत बताना, यदि मुल्ला इसके विषय में सुन लेगा तो वह उनके पीछे पड़ जाएगा।’’


।।म्लेच्छ, बहुत से म्लेच्छ संग लेकर श्रीजी के पीछे गयो।।

।।एक म्लेच्छ ने अन्य अनेक म्लेच्छों के साथ श्रीजी का पीछा किया।।


जब मुल्ला ने गिरिराजजी से इस देव के विषय में सुना, तब वह दंडौती घाट गया, उसने उनका ढेर सारे सैनिकों के साथ पीछा किया। बादशाह ने उन्हें चेतावनी दी कि वे उसके पीछे न जाएं, क्योंकि यह देव बहुत शक्तिशाली और करामाती है। परंतु म्लेच्छों ने उसकी बातें नहीं सुनी और चंबल नदी तक उनका पीछा किया। श्रीजी का रथ चंबल में रुका, इसलिए श्री गोविंदजी ने गंगाबाई से कहा कि वह श्रीजी से पूछे कि वह क्या करना चाहते हैं। उसने पूछा, ‘‘बाबा आपकी क्या इच्छा है?’’ इस पर श्रीजी ने उत्तर दिया, ‘‘मैं चंबल नदी पर रुकना चाहता हूं और यहां पर उत्थापन पूरा करना चाहता हूं।’’

शीघ्र ही जब म्लेच्छ भी उनके निकट पहुंचा, तब गोविंदजी चिंतित हो गए। उन्होंने गंगा बाई से इस विषय में पुनः श्रीजी से इसके विषय में एक बार फिर पूछने के लिए कहा।

श्रीजी, ‘‘उससे कहो उत्थापन को जारी रखे। हमें इन म्लेच्छों को लेकर चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। यदि वे आक्रमण करेंगे तब हम उन्हें देख लेंगे।’’ इसके बाद शंखनाद हुआ, जिसे सुन कर सभी शांत हो गए और अपनी सेवा को जारी रखा। श्रीनाथजी ने चमत्कार दिखाया और उनका रथ म्लेच्छ सेना को एक विशाल पर्वत के समान दिखा और श्रीजी के साथ के सभी सेवक विशालकाय सिंहों की तरह नजर आए।

म्लेच्छ सेना दिग्भ्रमित हो गई कि उन्होंने किसी एक व्यक्ति को भी नहीं देखा। यहां तक कि सेवकों के बीच का वार्तालाप भी सिंह की दहाड़ के समान प्रतीत हुआ। इससे ये म्लेच्छ डर कर भाग खड़े हुए एवं बादशाह के पास पहुंचे और उसे बताया कि यह देव कितना करामाती है।


।।कृष्णपुर पधारेवे के लिए गंगाबाई के प्रति श्रीनाथजी की आज्ञा।।

।।श्रीनाथजी ने गंगाबाई के माध्यम से कृष्णपुर छोड़ने का आदेश दिया।।


अगले दिन श्रीनाथजी ने गंगाबाई से कहा कि वह जाए और गोविंद जी से कहे कि वह वापस चंबल जाना चाहते हैं और दंडौती घाट तक जाना चाहते हैं। इसके बाद दंडौती घाट के आगे कृष्णपुर में श्रीजी ने विश्राम करने का निर्णय लिया।


।।श्री गोसाई जी के वरदानसू व्रजराजजी श्रीजी की सेवा सत्ताइस दिन किए।।

।।श्री गोसाईजी के आशीर्वाद के साथ व्रजराजजी ने सत्ताइस दिनों तक सेवा की।।


श्रीनाथजी ने यह महसूस किया कि व्रजराजजी यहां पर उनकी सेवा के लिए आए थे। उन्हें बालकृष्णजी को दिए गए वरदान को पूरा करना था, जिसे गोसाईजी ने अनेक वर्षों पूर्व व्रजराजजी को दिया था। इसलिए श्रीजी ने एक कोस की दूरी पर स्थित विशाल घर में रहने के लिए सेवकों के एक समूह को भेजा। व्रजराजजी को श्री गोसाईजी से एक पुराना वरदान प्राप्त हुआ है, जिसे मुझे पूर्ण करना है। वह वरदान के अनुसार अगले सत्ताइस दिनो तक सेवा करेंगे और आप सभी 28वें दिन वापस आएंगे तथा मेरी सेवा करेंगे।


।।श्रीजी की आज्ञा गंगाबाई ने श्रीगोविंददासजी सू कही।।

।।गंगाबाई ने श्री गोविंददासजी को यह संदेश पहुंचाया।।


गंगाबाई ने इस संदेश को श्री गोविंददासजी के पास पहुंचाया। श्रीजी ने हमें अलग रहने के लिए 27 दिन प्रदान किया है और यह हमारा कर्तव्य है कि हम श्रीजी के आदेश का पालन करें। श्री गोविंददासजी ने श्री आचार्यजी के निर्णय को याद किया। किसी भी प्रकार का प्रश्न अथवा विनती मत करिए। यदि श्रीजी ने आपको किसी प्रकार का आदेश दिया है तो उसका पालन पूरी पूर्णता से होना चाहिए, ताकि सभी अपने परिवार के साथ जा सकें और घर में रह सकें। श्रीजी ने गंगाबाई को रोज दर्शन दिया। यह गोविंदजी के लिए बहुत दुखद अवधि थी और उन्होंने भी एक फकीर के समान वस्त्र धारण करना प्रारंभ कर दिया।


।।अठ्ठाइसवें दिन श्री गोविंदजी ने श्रीव्रजराजजी को निकासू।।

।।श्री गोविंदजी ने व्रजराजजी को श्रीनाथजी की सेवा से अठ्ठाइसवें दिन निकाल दिया।।


अठ्ठाइसवें दिन जब गोपालजी और उनका परिवार सेवा के लिए आया, तब श्रीजी बहुत प्रसन्न थे। जब सभी भाई श्री गोविंदजी, श्री बालकृष्णजी, श्री वल्लभजी एवं श्री दाऊजी एक साथ एकत्रित हुए और श्रीजी का पूरा श्रृंगार किया, तब यह दर्शन बहुत अलौकिक हो गया था।


।।श्रीनाथजी मेवाड़ तक वापस में कैसे पधारे तको वर्णन।।

।।श्रीनाथजी की मेवाड़ की यात्रा का विवरण।।


इस प्रकार पहले चतुर्मास में श्रीनाथजी ने दंडौती घाट पर समय व्ययतीत किया। श्री गोविंदजी तीन भाई थे। उनमें से कुछ ने रसोइया, बालभोगिया, जलघरिया के साथ पहले ही यात्रा प्रारंभ की और उत्थापन को तैयार रखा। श्रीनाथजी राजभोग आरती के बाद प्रस्थान किए और उत्थापन द्वारा अगले पड़ाव पर पहुंचे। जहां पर उन्होंने भोग संध्या आरती एवं शयन को पूर्ण किया। श्रीजी तुरंत विश्राम के लिए चले गए और अगले दिन शीघ्र ही मंगला, श्रृंगार, ग्वाल और राजभोग को समुचित रुप से किए जाने का निर्णय लिया गया।

सभी ने महा प्रसाद ग्रहण किया और आगे बढ़ गए। एक भाई श्री वल्लभजी सेवक समूह के साथ आगे बढ़े, जबकि श्री गोविंदजी श्रीनाथजी के रथ के सामने सवार हुए। श्री बालकृष्णजी रथ के पीछे सवार हुए। पांच संतरियों ने कवच धारण कर रखा था। शस्त्रों से सुसज्जित हो कर समूह के साथ रहे, क्योंकि वे आगे बढ़ गए थे।

गांव के रास्ते पर जब एक दिन लोग दर्शन के लिए पूछते थे, तो उन्हें यह बताया जाता था कि श्रीनाथजी गिरिराजजी की कंदरा में हैं। इस रथ में केवल भाव वस्तु है, इसलिए यह स्पष्ट किया गया कि श्रीजी के दर्शन की किसी को भी अनुमति नहीं है।

श्रीजी ने अपने रथ में कुल 2 वर्ष, 4 माह और 7 दिन तक यात्रा की। मेवाड़ की यात्रा, जैसी कि ठाकुरजी इच्छा थी, 1669 ईसवी में आसाढ़ सूद पूनम को शुक्रवार के दिन प्रारंभ हुयी। यह रात्रि की अंतिम ३ अवधि के दौरान घटित हुयी। श्रीनाथजी फाल्गुन वद शतम के अवसर पर शनिवार के दिन 1672 ईसवी में सिंहद (नाथद्वारा) में अपने सभी सेवकों के साथ प्रकट हुए।

इस पूरे रास्ते में भोजन की व्यवस्था की गयी, इसमें इन लोगों के साथ गायों ने भी यात्रा की, इसलिए दुग्ध एवं दुग्ध उत्पादों की प्रचुरता बनी रही।


।।दंडौती घाट सू श्रीनाथजी कोटा तथा बूंदी पधारे।।


यहां से उन्होंने कोटा बूंदी के लिए प्रस्थान किया। अनिरुद्ध सिंह हाड़ा उस समय वहां के राजा थे। वह श्रीजी के दर्शन के लिए आए एवं उनसे वहां पर ठहरने का निवेदन किया। वह श्रीनाथजी के सुरक्षित प्रवास के लिए सभी आवश्यकताओं की देख-भाल करेंगे। पर श्री गोविंदजी ने इसे स्वीकार नहीं किया, परंतु यह कहा कि चूंकि राजा एक अच्छा वैष्णव है, इसलिए हम यहां पर कुछ समय के लिए ठहरेंगे।

उन्होंने सही स्थान को तलाशा और यह पाया कि कृष्ण विलास इसके लिए अच्छा रहेगा। कोटा शहर में कृष्ण विलास के पास एक कमल पर प्रस्तर का चिन्ह है, वहां पर श्रीनाथजी वर्षा ऋतु में ४ माह तक ठहरे थे।


।।श्रीनाथजी जोधपुर पधारवेको कोटा बूंदीसू पुष्करजी पधारे।।


यहां से श्रीजी जोधपुर के लिए रवाना हो गए और वह पुष्कर के मार्ग से गुजरे। पुष्कर की झील में श्रीजी का रथ फंस गया। गंगाबाई से पूछने पर कि श्रीजी ने अपने रथ को क्यों रोक दिया। इस पर श्रीजी ने कहा, ‘‘यहां पर पास में कोई झील है और मैं वहां पर खिले हुए कमल की सुगंध को महसूस कर सकता हूं। जल्दी करो और मेरे लिए कमल लेकर आओ और उसे मेरे रथ में रखो, मैं उसके सुगंध का आनंद लूँगा और उसके बाद आगे के लिए प्रस्थान करुंगा। इसके बाद मैं अपनी इच्छा के अनुसार जहां जाना चाहुंगा जाउंगा।’’

इस आदेश का पालन करते हुए कुछ व्रजवासी कमल के फूल को लाने के लिए पुष्कर झील चले गए। उन्होंने कई कमल को तोड़ा और उस स्थान पर काफी प्रसन्नतापूर्वक आए जहां पर श्रीजी का रथ खड़ा था। श्री गोविंदजी ने श्रीजी को यह कमल प्रस्तुत किया और चूंकि श्रीजी कमल को बहुत पसंद करते हैं, इसलिए सभी ने उन्हें कमल दिया। श्री बालकृष्णजी, श्री वल्लभजी, श्री दाऊजी महाराज उस समय एक छोटे बच्चे थे। सभी बहू और बेटियों ने श्रीनाथजी को कमल अर्पित किया।


।।श्रीनाथजी जोधपुर पधारवेकु पुष्करजीसू कृष्णगढ़ पधारे।।


अगला पड़ाव किशनगढ़ था। श्रीनाथजी का रथ निकटवर्ती नगर उजड में था। रुपसिंह के पुत्र राजा मानसिंह उस समय वहां के राजा थे।

जब श्रीजी गिरिराजजी में थे तब राजा रुप सिंह ने केसरी उपर्णना के साथ पीतांबर में श्रीनाथजी का दिव्य दर्शन किया था। राजा का लौकिक शरीर रणभूमि में मृत्यु को प्राप्त हो गया था। लोगों ने देखा कि उनका दिव्य शरीर श्रीजी के मंदिर में प्रवेश कर रहा है। यद्यपि सभी लोगों ने उन्हें श्रीनाथजी के मंदिर में प्रवेश करते हुए देखा, परंतु किसी ने भी उन्हें वहां से बाहर निकलते हुए नहीं देखा।

राजा मानसिंह ने यह सुना कि श्रीनाथजी उनके नगर में आए हैं और चूंकि श्रीजी उनके परिवार के इष्ट देव थे, इसलिए वह उनके दर्शन के लिए जल्दी से निकल पड़े। श्रीजी और उनके सेवकों ने अज्मीती नामक एक खाली गांव में एक शिविर लगाया था, जो ढाक के वृक्षों से युक्त एक सघन वन में स्थित था।

वहां पर एक सुंदर झील थी और निकटवर्ती पर्वत श्रृंखला से एक नदी प्रवाहित हो रही थी। श्रीनाथजी को यह स्थान बहुत पसंद आया और उनका रथ वहीं पर रोक दिया गया। जब राजा दर्शन के लिए आए, तब उन्होंने श्री गोविंदजी से यह अनुरोध किया कि वे यहां पर सदैव के लिए रुक जाएं। उन्होंने इस बात की वचनबद्धता प्रकट की कि वे म्लेच्छों से ठाकुर जी की रक्षा को सुनिश्चित करेंगे और इसके अतिरिक्त यह वन बहुत सघन है तथा ढाक के वृक्षों व केसुदा के पुष्पों से बहुत सुरम्य प्रतीत होता है। जब श्रीजी से उनकी इच्छा पूछी गयी तब उन्होंने कहा कि, ‘‘मैं वहां पर रुकुंगा और वसंत ऋतु का उत्सव मनाउंगा, जिसमें बस तीन माह का समय रह गया है। इसके बाद हम मारवाड़ के लिए रवाना हो जाएंगे।


।।श्रीजी मारवाड़ पधारत पेडेमें वीसलपुर के वैरागी कू दर्शन देनाए।।


जब श्रीजी गिरिराजजी में रहते थे, तब वहां के एक निकटवर्ती गांव वीसलपुर में एक गुरु और उनके शिष्य निवास करते थे। वे दोनो गंगाजी में स्नान करने के लिए गए वहां से वे गिरिराजजी आए और गुरु दर्शन के लिए ऊपर चढे, परंतु शिष्य ने श्री भागवत ग्रंथ का अवलोकन किया, जिसके एक श्लोक के अनुसार श्री गिरिराजजी भगवान स्वरुप हैं। इस पर शिष्य ने यह सोचा कि यदि वह भगवान रुप हैं, तो गिरिराजजी पर चढ़ना गलत होगा। इसके बाद उसके गुरु दर्शन के बाद नीचे आए और उन्होंने श्रीनाथजी के दर्शन के सौन्दर्य का खूब बखान किया, परंतु शिष्य गिरिराजजी पर नहीं चढ़ा। ये लोग तीन दिन तक गिरिराजजी के निकट ठहरे और उनकी परिक्रमा की। इसके बाद वे लोग वापस लौट गए, परंतु शिष्य ने दर्शन नहीं किया। अनेक वर्षों के बाद गुरु ने अपने भौतिक शरीर को त्याग दिया और शिष्य महंत बन गया। श्रीनाथजी उसके सपने में आए और कहा, ‘‘मैं श्री ठाकुरजी हूं, जिसका दर्शन तुमने पहले नहीं किया। कल मेरा रथ तुम्हारे गांव से गुजरेगा, तुम वहां पर आना और मेरे रथ को रोक लेना। श्री गोविंदजी से मेरे दर्शन के लिए निवेदन करना, यदि श्री गोविंदजी मना कर देंगे, तब उन्हें मेरे श्रृंगार के विषय में बताना जो श्वेत पग पिछोड़ा श्रृंगार होगा। उन्हें यह बताना कि तुम्हें यह पता है कि श्रीनाथजी इस रथ में हैं, कृपया उनका दर्शन कीजिए। श्री गोविंदजी मेरा दर्शन करा देंगे। तुम लकड़ी का एक पटिया भी बनाना और मेरे रथ के सामने रख देना। मैं उस पटिए पर बैठ कर प्रतिदिन राजभोग करुंगा। इस प्रकार श्रीजी ने उसे उसके सपने में आदेश दिया।


यह सब कुछ हूबहू घटित हुआ, क्योंकि श्रीजी ने इसकी इच्छा प्रकट की थी। शिष्य ने उनका दर्शन किया और उसकी बनाई गयी पटिया को स्वीकार किया। उस दिन श्रीजी ने पटिया पर आसीन होकर राजभोग को ग्रहण किया और जब वे आगे बढ़े तब सेवक यह कहते हुए चले गए कि वैरागी इसे बाद में ग्रहण करेंगे। उनकी मनोरथ पूरी हो गयी। बाद में जब वैरागी वापस आया तो उसने देखा कि पटिया वहीं पर पड़ी हुयी है और वह यह सोच कर काफी दुखी हुआ कि श्रीजी ने उसे पटिया को बनाने का आदेश दिया था, परंतु उन्होंने उसके द्वारा स्वीकार नहीं किया। इसलिए उसने उसे उठाया और वापस अपने घर ले गया एवं उसे उचित स्थान पर रख दिया।


श्रीनाथजी का रथ आगे बढ़ा और तीन कोस आगे जाने पर रुक गया। सेवकों के अनेक प्रयास के बावजूद भी वह वहां से नहीं हिला। अंततः श्री गोविंदजी ने गंगाबाई से कहा कि, ‘‘जाओ और श्रीजी से पूछो कि उनकी इच्छा क्या है। ‘‘यहां मीलों तक कोई गांव नहीं है, न कोई जल और न कोई छाया, ऐसी स्थिति में उन्होंने अपने रथ को यहां क्यों रोक दिया?’’ इसलिए गंगाबाई ने श्रीजी से पूछा, ‘‘हे बलिहारी लाल, रथ क्यों रुक गया है, यह चल नहीं रहा है?’’ श्रीजी ने उससे कहा, ‘‘मेरे राजभोग के लिए प्रयुक्त होने वाली पटिया को वैरागी ने मुझे उपलब्ध कराया था। मैंने उसके स्वप्न में उसे यह आदेश दिया था कि वह मेरे लिए एक पटिया बनाए। इन लोगों ने उस पटिया को वहीं पर छोड़ दिया। मैं यहां से तभी जाउंगा जब उस पटिया को वापस लाया जाएगा। उसके बाद ही मैं उस पटिया पर अपना राजभोग ग्रहण करुंगा।’’ इस प्रकार रथ उसी समय आगे बढ़ा जब पटिया वापस आ गयी और उसे उन्होंने अपनी सेवा में ले लिया। उस दिन से श्रीजी ने अपना राजभोग उस पटिया पर ग्रहण करना प्रारंभ किया।


।।श्रीजी जोधपुर पधारे चंपायनी में चतुर्मास विराजे।।


यहां से श्रीजी जोधपुर गए। जोधपुर के पास तीन कोस की दूरी पर चंपासेनी गांव स्थित था, जहां पर श्रीनाथजी ने ठहरने की अपनी इच्छा को प्रकट किया। यहां पर एक विशाल कदम खेड़ी था और इस चंपासेनी गांव में श्रीनाथजी ने तीसरा चतुर्मास (चार माह की वर्षा ऋतु) को व्ययतीत किया। जब उन्होंने गिरिराजजी से यात्रा प्रारंभ की थी। श्रीनाथजी श्रीजी ने रास्ते में तीन चतुर्मास व्ययतीत किया। पहला चतुर्मास चंबल नदी के निकट दंडौती घाट में कृष्णपुर में बिताया गया। दूसरा चतुर्मास कोटा स्थित कृष्ण विलास में बिताया गया (वह यहां पर चार माह के लिए ठहरे)। तीसरा चतुर्मास जोधपुर के चंपासेनी में व्ययतीत किया गया। उन्होंने यहां पर अन्नकूट भी मनाया। यहां पर उनका निवास लगभग पांच माह का रहा।

चौथा चतुर्मास श्रीनाथजी ने मेवाड़ के अपने मंदिर में बिताया।

2 वर्ष, 4 माह एवं 7 दिनो तक श्रीनाथजी ने व्रज से मेवाड़ की यात्रा की। इस दौरान वह अपने रथ में रहते थे। इनकी यात्रा के दौरान जिन स्थानो को इनके आगमन का सुख प्राप्त हुआ, उनमें हिंदमुल्तान, दंडौती घाट, बूंदी, कोटा, धूंधर, मारवाड़, बांसवाड़ो, डूंगरपुर, शाहपुरा सम्मिलित हैं।


।।श्री गोविंदजी ने उदयपुर पधार राणाजी श्रीराजसिंहजी सू श्रीजी के मेवाड़ में विराजवे को निहचय कियो।।


श्री गोविंदजी राणाश्री राजसिंहजी से मिलने गए और उन्हें मेवाड़ में निवास की श्रीनाथजी की योजना के विषय में बताया। राजा ने अपनी वृद्ध माता से पूछा, ‘‘ब्रज के ठाकुरजी म्लेच्छों के उपद्रव के कारण यहां पर आए हैं और यहां पर रहना चाहते हैं। यदि आप मुझे अनुमति दें तो मैं उन्हें निमंत्रित कर लूं। परंतु यदि म्लेच्छ इसके कारण युद्ध प्रारंभ कर देते हैं, तब मेरा कर्तव्य क्या होगा?’’

इस पर राणा की मां ने उनसे कहा, ‘‘यह मीरा बाई और अजब कुंवरी का सौभाग्य है कि श्रीजी ने यहां आने निर्णय लिया, परंतु तुम्हें भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि ठाकुरजी की देख-भाल करना एक प्रमुख सरोकार है, इसलिए उनकी हरसंभव सेवा की जानी चाहिए। हम राजपूत अपनी भूमि के लिए अपने जीवन का बलिदान कर देते हैं। अपना जीवन समर्पित कर देते हैं, इसलिए श्री ठाकुरजी की सुरक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित कर देना एक बहुत ही विशिष्ट बात है। इसलिए यदि म्लेच्छ आक्रमण करते हैं, तो उसे लेकर चिंता मत करो। विलंब मत करो और तुरंत जाओ और उन्हें लेकर आओ।’’

राणाजी अपनी मां के शब्दों को सुन कर अत्यधिक प्रसन्न हो गए और श्री गोविंद जी से निवेदन किया कि कृपया जल्द करें, हम श्री ठाकुरजी का स्वागत करना चाहते हैं।’’ श्री गोविंदजी चंपासेनी वापस आए और इसकी सूचना श्रीनाथजी को दी। श्रीजी ने घोषित किया, ‘‘मैं मेवाड़ जाउंगा। हमने यहां पर चतुर्मास पूरा कर लिया है। अन्नकूट मनाएंगे और उसके बाद अपनी यात्रा प्रारंभ करेंगे।’’


।।श्रीजी मेवाड़ में पधारे ताको सविस्तार वृत्तांत।।

।।मेवाड़ में श्रीजी के आगमन का विस्तृत वर्णन।।


इस प्रकार 1671 ईसवी में कार्तिक पूर्णिमा के दिन श्रीनाथजी मेवाड़ पहुंचे। श्रीजी का उत्थापन, भोग, आरती, शयन एक छोटे गांव में किया गया, जिसके पास एक बहुत गहरी झील थी।

चूंकि इस झील के जल को पुष्कल पाया गया, इसलिए इस जल को उस दिन श्रीनाथजी की सेवा में प्रस्तुत किया गया। बाद में रात के समय अचानक सभी सेवकों ने झील की तरफ से जयजयकार की गूंज सुनी, चूंकि इस जयजयकार के स्रोत का पता नहीं चल रहा था, इसलिए ये सभी झील के किनारे एकत्रित हुए और पूछा, ‘‘तुम लोग कौन हो? और कौन यह जयजयकार कर रहा है?’’

इसका उत्तर आकाश मार्ग से आया, हम लोग हजारों की संख्या में भूतगण हैं, जो इस झील में हजारों वर्षों से रह रहें हैं, क्योंकि हमें मुक्ति नहीं मिल पायी है। आज जब श्रीनाथजी ने इस झील का जल ग्रहण किया, तब एक पुष्पक विमान आया और कहा कि यहां पर जितने भी पिशाच रहते हैं वे दिव्य शरीर प्राप्त करेंगे और उसके साथ वैकुंठ में आएंगे। श्री वैकुंठनाथजी ने हमें इस आकाशीय विमान में सवार होने के लिए कहा। जब श्रीनाथजी ने इस झील से जल ग्रहण किया, तब उन्होंने हम सभी को मुक्ति प्रदान कर दी। इस क्षण के लिए हजारों वर्षों से प्रतीक्षा करने के बाद आज हम उनकी कृपा से मुक्त हो गए। अब वैकुंठ के लिए रवाना होने के पहले हम यह जयजयकार कर रहे हैं।’’

श्री गोविंदजी एवं वहां पर एकत्रित होने वाले सभी लोग इस वार्ता को सुन कर आश्चर्यचकित हो गए मध्य रात्रि से लेकर प्रातःकाल तक इस जयजयकार को सुना जा सकता था।

अगले दिन श्रीनाथजी के राजभोग के पूर्ण होने के बाद उन्होंने अपनी यात्रा प्रारंभ की और इसके बाद २३ दिनो में सिंहद (जो बाद में नाथद्वारा के नाम से जाना गया) पहुंच गए।


यहां पर श्रीनाथजी का रथ एक पीपल के वृक्ष के नीचे आकर रुक गया। जब इसके विषय में पूछा गया कि ऐसा क्या हुआ तब श्रीजी ने उत्तर दिया, ‘‘मेरी भक्त अजब कुंवरी बाई यहां रहती थी, इसलिए मेरे मंदिर का निर्माण किया जाना चाहिए। राणाजी ने उदयपुर में मेरे प्रवास की इच्छा प्रकट की, परंतु इस मनोरथ को मैं बाद में पूरा करुंगा। फिलहाल अभी अजब कुंवरी बाई स्थल पर अपने मंदिर का निर्माण कराउंगा। यहां पर मैं लंबे समय तक निवास करुंगा। यह स्थान मुझे व्रज की याद दिलाता है। मैं यहां के पर्वतों को पसंद करता हूं।’’ ‘‘यहां पर बनास नदी भी है, जो यमुनाजी का प्रतिनिधित्व करती है।’’ श्रीजी ने कहा कि, ‘‘यह अजब कुमारी की भूमि है। मैं यहां पर ठहरुंगा। सभी गोसाई बालकों से कहो कि वे यहां भी अपने बैठक का निर्माण करें।’’

श्री गोंविंदजी ने मंदिर बनाने की तैयारी को प्रारंभ किया। उन्होंने गोपालदास उत्सा को अधिकतम लोगों को नियुक्त करने का आदेश दिया तथा साथ में यह सुनिश्चित करने के लिए कहा कि श्रीनाथजी के मंदिर को हर संभव शीघ्रातिशीघ्र निर्मित किया जाए। यह काम सैकड़ों मजदूरों के साथ प्रारंभ हुआ और दिन-रात निरंतर जारी रहा तथा कुछ माह के बाद ही श्रीजी का मंदिर बन कर तैयार हो गया।

फाल्गुन वद शतम में शनिवार के दिन स्वाती नक्षत्र अर्थात् 1672 ईसवी में श्री दामोदर महराजजी (श्रीदाऊजी) ने मंदिर हवेली में श्रीनाथजी के पट की स्थापना की। इसे वास्तु प्रतिष्ठा एवं पूजन के साथ पूर्णता से वैदिक पद्धति से किया गया। धीरे-धीरे विभिन्न प्रकार के सभी पूजन एवं पर्व यहां पर ठीक उसी प्रकार से मनाए जाने लगे जैसे कि श्रीगिरिराज जी में मनाए जाते थे। उस समय से श्रीजी ने बेहद प्रसन्नतापूर्वक मेवाड़ में निवास करना प्रारंभ कर दिया। यहां पर श्रीजी की सभी गायों के लिए यहां के निकट एक गोशाला का निर्माण भी कराया गया।

श्री दाऊजी महराज ने पूरे स्नेहिल भाव से श्रीजी की देख-भाल और सेवा की तथा सभी उत्सवों एवं महा उत्सवों को मनाया। श्रीजी के समूचे श्रृंगार को उन्होंने ही किया।

श्रीजी ने अपने रथ पर कुल 2 वर्ष, 4 माह और 7 दिन तक यात्रा की।


।।बादशाह ने श्रीजी के मेवाड़ विराजवेके समाचार सुनके महाराजा श्रीराजसिंह पे चढ़ाई कीनी।।


चार वर्ष शांतिपूर्वक व्ययतीत हो गए। महाम्लेच्छ ने अपने हल्कारे से कहा, ‘‘जो देव श्री गिरिराज को छोड़ कर चले गए वह अब कहां पर हैं?’’ कुछ दिन खोजने के बाद उन्हें यह पता चला कि श्रीजी अब मेवाड़ में रह रहे हैं। इससे बादशाह म्लेच्छ काफी प्रसन्न हो गया, ‘‘मैं यह समझता था कि वह केवल मेरी भूमि पर रहेंगे, परंतु उन्होंने मेरी भूमि को छोड़ दिया और अब राणाजी की भूमि में रह रहे हैं। मैं राणा जी से मिलने के लिए जाउंगा।’’

बादशाह आया और उसने रायसागर में अपना शिविर लगाया। इसके बाद राणाजी ने अपने परिवार को मेवाड़ में छिपा दिया एवं चालीस हजार सैनिकों की टुकड़ी के साथ सीमा पर आ गया।


।।जब बादशाह और राणाजी की फौजनके डेरा रायसागर नहरमगारपे बए तब श्रीजी गर्म बतारा पधारे।।


उस दिन श्रीजी ने गंगाबाई को आदेश दिया, ‘‘जाओ और श्री दाऊजी से कहो कि बतारा नामक एक गांव है, जहां पर विभिन्न प्रकार के वृक्ष हैं। केवड़ा, केतकी, चमेली, रायवेल्हो.. यहां पर सब कुछ आसानी से पनपते हैं। मैं इस स्थान को देखना चाहता हूं। यहां के पर्वत में एक गुफा है जहां पर एक ऋषि सैकड़ों वर्षों से तपस्या कर रहा है। उसका मानना है कि श्रीजी मुझे इस पर्वत पर दर्शन देंगे। उसने अपने प्राण को अपने सिर में सुरक्षित रखा है, जिसके कारण सैकड़ों वर्षों से वह जीवित है और वह मेरे आने की प्रतीक्षा कर रहा है। मैं वहां पर तीन दिनो तक रहूंगा, उसे दर्शन दूंगा और यहां पर अपने मंदिर में वापस चला आउंगा।’’


गंगाबाई ने उनके इस आदेश को श्री दाऊजी को पहुंचाया, जिन्होंने इस संदर्भ में आवश्यक प्रबंध किया। रास्ते में जहां कहीं भी सड़क खराब थी, वहां पर श्री दाऊजी ने कपास के गद्दे बिछा दिए ताकि श्रीजी का रथ आसानी से बिना हिचकोले खाए पार कर जाए और श्रीजी को कोई कठिनाई नहीं उठानी पड़े।


श्रीजी तीन दिन तक उस पर्वत पर रहे और वह इस दौरान बहुत प्रसन्न थे। जब राजभोग दर्शन को खोला गया तो वहां पर बैरागी नीलकमल से बनी माला के साथ दर्शन के लिए आए। नीलकमल पृथ्वी लोक में नहीं पाया जाता। इससे यह पता चलता है कि यह ऋषि देवलोक गया था, जहां उसने नीलकमल की माला तैयार की और उसे श्रीजी को प्रस्तुत किया।


श्रीनाथजी की अनुमति से उसने शुद्ध मलयागर चंदन को सेवा के लिए प्रस्तुत किया। यह चंदन बहुत शुद्ध होता है। इसकी केवल एक रत्ती को सवा मन तेल में मिला दिया जाए तो इससे बेहद मधुर सुगंधि उत्पन्न होती है। इसके बाद वार्ता हमें यह बताती है कि किस प्रकार विष्णु दूत आए और वैरागी को अपने साथ वैकुंठ ले गए। श्रीजी ने श्री दाऊजी को यह आदेश दिया कि इस चंदन के एक सूक्ष्म हिस्से को गर्मियों में उनकी सेवा के लिए उपयोग में लाए जाने वाले चंदन में मिलाया जाए।

इस समूची यात्रा में श्रीनाथजी ने अनेक चमत्कारों को प्रदर्शित किया। कहीं पर श्रीजी ने वरदान दिया और कहीं पर क्रीड़ा करते रहे। श्रीजी ने जो कुछ भी किया वह अपने भक्तों के लिए किया।

इनमें से अनेक का विवरण प्रसिद्ध 84 वैष्णव की वार्ता में उपलब्ध है। गंगाबाई इस पूरी यात्रा में श्रीजी की आवाज थीं और वह वाह्य विश्व से श्रीजी के सभी संवादों को स्थापित करने का माध्यम बनी रहीं।

कुछ वर्षों तक श्रीजी ने खूब चमत्कार दिखाया। ऐसी अनेक वार्ताएं हैं जिनका विवरण इस पुस्तक में है।


।।श्रीनाथजी के सेवक माधवदास देसाई।।


भगवानदास श्री गोवर्धननाथजी के सेवक थे, जिनका नाम गोकुलनाथजी द्वारा बदल कर माधवदास कर दिया गया था। वह श्रीजी के दर्शन हेतु आने के लिए तत्पर रहते थे और उन्होंने दर्शन करने के लिए जाते समय रास्ते में एक बहुत बड़ी राशि को वंचित लोगों में बांट दिया था। जब भी वे घर से श्रीनाथजी के दर्शन के लिए जाते थे, तब वह केवल दूध और फल खा कर रहते थे। वह अन्य सभी पके हुए खाद्य पदार्थों का सेवन बंद कर देते थे।


श्रीजी ने माधवदास को उनके स्वप्न में आदेश दिया, ‘‘एक महिला के नख से लेकर शिख तक के श्रृंगार के एक लक्ष मुद्रा की कीमत के समूचे गहने तैयार कराओ। उसे एक मंजूषा में रखो और जब अगली बार मेरे दर्शन के लिए आओ तब अपने साथ लेकर आओ तथा उन गहनो को मुझे चढ़ाओ।’’ 1685 ईसवी में चैत्र माह में यह वैष्णव दर्शन के लिए आया और श्रीजी के सम्मुख आभूषणों की उस मंजूषा को प्रस्तुत किया।

बाद में श्री गोवर्धननाथ ने श्री दाऊजी को आदेश दिया कि, ‘‘जो गहने आए हैं। वह एक महिला के नख से लेकर शिख तक के श्रृंगार के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। मैं चाहता हूं कि गंगाबाई इसे पहने और मेरे भोग दर्शन के लिए आए।’’ यही आदेश उन्होंने गंगा बाई को भी दिया।

जब वह मंदिर में आयीं तब श्रीजी ने उसे आदेश दिया कि वह सारे आभूषण उतार कर शय्या मंदिर में स्टूल पर रख दे। यहां से उसने श्रीनाथजी की लीला में प्रवेश किया और वाह्य जगत के साथ श्रीजी के सभी संपर्क बहुत कम हो गए।


।।इति श्रीनाथजी की प्रगट्य वार्ता संपूर्ण।।


जिस समय श्रीनाथजी ने मेवाड़ जाने का निर्णय लिया, तब उन्होंने प्रत्यक्ष रुप से संवाद स्थापित करना बंद कर दिया और जब बाद की समयावधि में उन्हें आवश्यक भाव नहीं प्राप्त हुआ, तब वह पूरी तरह से अंतर्लीन हो गए। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि अपने भक्तों के साथ संपर्क स्थापित करने के लिए प्रभु को उच्च स्तरीय शुद्धता की आवश्यकता होती है।

‘‘यद्यपि आज उनकी उपस्थिति को नाथद्वारा हवेली में उनकी गहन आराधना करने वाले लोग महसूस करते हैं, अब कोई व्यक्तिगत भेंट संभव नहीं हो पाती। ऐसी बहुत दुर्लभ व भाग्यशाली दैवीय आत्माएं हैं, जिन्हें श्रीजी प्रेम करते हैं।’’

श्रीनाथजी के इतिहास की महत्वपूर्ण तिथियां

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