ShreeNathji makes me His ‘Best Friend’

ShreeNathji Thakurli makes me His ‘Best Friend’

श्रीजी; “ओके तुम मेरी बेस्ट फ्रेंड हो; मैं तुम्हारे साथ खेलने आऊंगा” .


श्रीनाथजी आज भी हमारे बाहरी दुनिया बहुत ही जीवंत रूप में मौजूद हैं, कमी सिर्फ़ हमारी भाव शुद्धि में है जो हम यह महसूस नहीं कर पा रहें हैं;

(ऐसा महसूस होता है के एक बार फिर से ८४ वैष्णव और २५२ वैष्णव के वार्ता दोहराई जा रही है)


यह दिव्य अनुभूति कुछ साल पहले से है, क़रीब २००५ से है।

This Divine Anubhuti is from some years ago.


हम नाथद्वारा में हैं, श्रीजी के हवेली के बाहर; हमेशा के नियम अनुसार मंगल के एक घंटे पहले। हमारा नियम है, दरवाज़े पर जल्द आकर श्रीनाथजी प्रभु का इंतज़ार करें

We are waiting outside Shreeji Haveli at Nathdwara. As usual we are here sixty minutes earlier then the Mangla Darshan timing. It’s a niyam (rule), with Gurushree, to be present much before the Darshan opens and wait for Shreeji.



दर्शन खुलने के लिए इंतज़ार करते हुए, मैं कोशिश करती हूँ, श्रीनाथजी प्रभु का ध्यान करने की; कुछ विचार भी थे जो गुरुश्री से पहले चर्चा हुई, जीस में वे समझा रहे थे किस क़दर आजकल भाव में कमी होने के कारण ठाकुरजी को श्रम महसूस होता है।

Waiting for the doors to open, I try meditating on ShreeNathji. Also some thoughts from an earlier conversation with Gurushree were in my mind. He explained to me how purity of bhao has deteriorated in humans and the shram that Shreeji might be experiencing.


यहाँ खड़े हुए मुझे कुछ दुःख हो रहा था, यह सोच कर की श्रीनाथजी भी शायद भक्ति की कमी महसूस करते होंगे। हमें सत्य मालूम है, की श्री गोवर्धन पर श्री ठाकुरजी उनके ग्वाल बाल के साथ कितना खेल का आनंद लेते थे।

I wondered how sad Shreeji must be today with this loss of devotion. The truth is there as history, how much Shreeji enjoyed playing Live with His Vrajvasis when He Lived on Shri Govardhan.


अचानक मुझे श्रीजी की मधुर गुंजन सुनाई दी, जैसे की वह कुछ शिकायत करना चाह रहें हैं.…

Suddenly I heard ShreeNathji’s sweet and melodious voice echoing inside, as if complaining,



श्रीजी: “यह मुखिया सिर्फ फिरकी घूमता रहता है इतने सालों से.

मैं तो बोर हो गया .

मैं तो भाग जाता हूँ.

कुछ नया तो सोचते ही नहीं .

देखो मुझे कैसे लालच देकर काम करवाते हैं .

एक लड्डू ज्यादा देकर कहते हैं की मेरा काम करो.

कोई मेरे साथ खेलने या मस्ती करने तो आता ही नहीं.

Shreeji: “Since sooooo many years this mukhiya only rotates a phirkee.

I have become very bored.

I run away from here.

They do not think of anything new.

All tempt Me with an extra Laddoo to make Me do their work.

No one comes to just play and have fun with me anymore”.



इस अनुभूति से बहुत आनंदित होकर मैंने जवाब देने की कोशिश करी;

मैंने कहा: ‘श्रीजी अगर आप चाहें तो मैं आपकी फ्रेंड बन सकती हूँ, आप के साथ खेल सकती हूँ, अगर आप मुझसे दोस्ती करना चाहें तो’ .

Over joyed in this anubhuti, I replied;

I ask Shreeji: ‘Shreeji, if You wish I could be Your friend. I will always play whenever You want; if You wish to accept my friendship’.



मैं आस्चर्या चकित हो गई श्रीजी से यह जवाब सुनकर;

I was thrilled to receive an answer, immediately,



श्रीजी; “ओके तुम मेरी फ्रेंड हो; मैं तुम्हारे साथ खेलने आऊंगा.

तुम मेरी बेस्ट फ्रेंड हो मैं और सिर्फ तुम ही हमेशा मेरी फ्रेंड रहोगी, और कोई नहीं".

Shreeji: “Ok, you are my friend, I will come to play with you.

You are my ‘best friend’ and you will be the only ‘friend’ I will ever have”.



और तभी से, श्रीजी ने उनकी कही हुई बात निभाई है, और मुझे कई दिव्य अनुभूति का हिस्सा बनाया है.

ऐसे बहुत सारे अमूल्य क्षण का हिस्सा बनी हूँ जब श्रीजी की कृपा से उनकी दिव्य हाजिरी और उनकी मधुर आवाज़ के गुंजन से लीला और खेल करते हैं.

And since then He has kept to His word, and made me a part of many Divine Leelas.

There have been innumerable precious moments when I have been graced with ShreeNathji’s Divine Presence and the gunjan (echo) of Shreeji’s Divinely sweet voice, where He talks and plays various leelas.



(ऐसा महसूस होता है के एक बार फिर से ८४ वैष्णव और २५२ वैष्णव के वार्ता दोहराई जा रही है)

(It is like a repeat of the 84 Vaishnavs or 252 Vaishnav Ki Vaarta, in today’s time period).


ठाकुरजी की आवाज़ कभी एक नन्हें बालक के तरह मधुर और मीठी होती है, कभी थोड़ी बड़ी उम्र के जैसे बात चीत करते हैं, जब कुछ गम्भीर बात बतानी होती है तो बड़े श्रीजी जैसे बात करते हैं।

At times this is the voice of a very young infant; at other moments like an older child or at times an adult talking about various happening.



सोचती हूँ की शायद ऐसा भी हो सकता है की, श्रीजी यहाँ से और कहीं चले जाना चाहते हों, या भाग भी जाते होंगे मंदिर से तो कौन जान पाएगा? अपना समय कुछ चुने हुए भक्तों के साथ बिताना चाहते हों;

Maybe Shreeji would actually want to move away and be elsewhere, maybe He actually runs away from the mandir after the first few moments of giving darshans;

He could be spending His day with a few true devotees who keep total love and devotion- bhao for Him.

In fact you will never truly know where He truly is today; as none is close enough to Him.



इतना तो ज़रूर है, की मेरे कुछ पिछले जन्म के संस्कार शुभ हैं, की ठाकुरजी स्वयं ने इस जीव आत्मा को चुना इन पवित्र अनुभव और खेल के लिए!

मेरी प्रार्थना है, की जो भरोसा भगवान श्रीनाथजी और गुरुश्री सुधीर भाई मुझ पर करते हैं मैं हमेशा उसे पूर्ण शुद्धि भाव से निभा सकूँ।

It is some very good past karma that Thakurjee Himself has selected this soul for such highly pavitra experiences.

I pray that I am always able to keep up to the trust that has been bestowed upon me by my God, ShreeNathji, and my Gurushree, Shri Sudhir bhai.



हमेशा पूर्ण शुद्धि और नम्रता के साथ आप के दिव्य चरणों की सेवा में

आभा शाहरा श्यामा

जय हो प्रभु!

Please always let me be in surrender and humility at Your divine Charan.

Abha Shahra Shyama

Jai Ho Prabhu!



Jai ShreeNathji Prabhu

Jai Gurushree, who made this divy friendship possible



5 views0 comments